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अल फलाह ग्रुप के चेयरमैन को HC से राहत, मकान पर बुलडोजर ऐक्शन पर रोक

Al Falah University Chancellor Case: फरीदाबाद के अल फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन अहमद सिद्दीकी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. आइए विस्तार से जानें पूरा मामला.

MP High Court on Al Falah University Chancellor Case: दिल्ली धमाके (Delhi Blast) को लेकर फरीदाबाद के अल फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन अहमद सिद्दीकी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. दरअसल यूनिवर्सिटी के चैयरमेन के महू स्थित पैतृक मकान के कथित अवैध निर्माण को अवैध बताया था. जिसपर इंदौर पीठ ने अंतरिम रोक लगा दी है, अब चलिए विस्तार से जानें पूरा मंजरा क्या है.

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के मुताबिक, अल फलाह यूनिवर्सिटी के चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी असल में महू के रहने वाले हैं. उनके पिता हम्माद अहमद लंबे समय तक महू के शहर काज़ी रहे, कई साल पहले उनका निधन हो गया था. इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर महू में मुकेरी मोहल्ला में मकान नंबर 1371, कैंटोनमेंट बोर्ड के रिकॉर्ड में जवाद अहमद सिद्दीकी के स्वर्गीय पिता हम्माद अहमद के नाम पर रजिस्टर्ड है. कैंटोनमेंट बोर्ड के 19 नवंबर को जारी नोटिस में कहा गया था कि घर पर कथित अवैध कंस्ट्रक्शन को तीन दिन के अंदर हटाया जाना चाहिए, ऐसा न करने पर बोर्ड कानूनी नियमों के तहत स्ट्रक्चर को गिरा देगा और इस कार्रवाई का खर्च रहने वाले या प्रॉपर्टी मालिक के कानूनी वारिसों से वसूल करेगा. यह ध्यान देने वाली बात है कि हाल ही में बुलडोजर से अवैध कंस्ट्रक्शन गिराए जाने की घटनाएं सामने आई हैं.

'हिबाह' के तहत दी गई प्रॉपर्टी पर दावा

महू में इस घर में रहने वाले अब्दुल मजीद (59) ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में कैंटोनमेंट बोर्ड के नोटिस को चुनौती देते हुए एक पिटीशन फाइल की है. मजीद ने पिटीशन में कहा है कि जवाद अहमद सिद्दीकी ने उनके पिता हम्माद अहमद की मौत के बाद 2021 में उन्हें 'हिबाह' के तहत प्रॉपर्टी दी थी. पिटीशनर ने मालिकाना हक का दावा किया: मजीद, जो खुद को किसान बताते हैं, ने पिटीशन में दलील दी है कि हिबानामा के आधार पर वह, यानी पिटीशनर, मालिक हैं.

बिना सुनवाई के नोटिस

मजीद के वकील अजय बगारिया ने कोर्ट में दलील दी कि कैंटोनमेंट बोर्ड ने उनके क्लाइंट को सुनवाई का मौका दिए बिना नोटिस जारी कर दिया. उन्होंने आगे दलील दी कि उनके क्लाइंट को सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए. इस बीच, कैंटोनमेंट बोर्ड के वकील आशुतोष निमगांवकर ने कोर्ट में दलील दी कि इस घर के बारे में पहले भी नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन कोई जवाब फाइल नहीं किया गया. इसलिए, पिटीशनर को जवाब फाइल करने का समय नहीं दिया जाना चाहिए.

30 साल पहले जारी किया गया था नोटिस

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद, जस्टिस प्रणय वर्मा ने कहा कि हालांकि पिटीशनर को पहले भी नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन वे लगभग 30 साल पहले, 1996/1997 में जारी किए गए थे. नोटिस अब जारी किया गया है. सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि अगर पिछले नोटिस के लगभग 30 साल बाद पिटीशनर के खिलाफ कोई कार्रवाई की जानी है, तो उसे सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए. इसलिए, मामले के मौजूदा तथ्यों को देखते हुए, पिटीशनर को निर्देश दिया जाता है कि वह 15 दिनों के अंदर रेस्पोंडेंट/सक्षम अथॉरिटी के सामने ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स के साथ अपना जवाब फाइल करे.

सुनवाई पूरी होने तक कोई कार्रवाई नहीं. कोर्ट ने यह भी कहा कि पिटीशनर को सुनवाई का पूरा मौका दिया जाएगा। फिर एक रीज़निंग ऑर्डर जारी किया जाएगा. प्रोसेस पूरा होने तक पिटीशनर के खिलाफ कोई ज़बरदस्ती की कार्रवाई नहीं की जाएगी. कोर्ट ने साफ किया कि वह पिटीशन की मेरिट पर कोई राय दिए बिना उसका निपटारा कर रहा है.

Shristi S

Shristi S has been working in India News as Content Writer since August 2025, She's Working ITV Network Since 1 year first as internship and after completing intership Shristi Joined Inkhabar Haryana of ITV Group on November 2024.

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