MP News: मध्य प्रदेश में तकनीक की कीमत किसानों को चुकानी पड़ रही है. दरअसल, बताया जा रहा है कि सरकार के डिजिटल रिकॉर्ड में गेहूं की फसल को चना, सरसों, टमाटर, मिर्च और यहां तक कि खाली जमीन के तौर पर दिखाया गया है.
मध्य प्रदेश में एआई ने गेहूं की फसल को चना, सरसों, टमाटर, मिर्च और यहां तक कि खाली जमीन तक दिखा दिया.
MP Farmer News: मध्य प्रदेश (MP News) में इस मौसम में खेतों में सिर्फ गेहूं ही नहीं उगा है, बल्कि एक संकट भी खड़ा हो गया है. गांवों में हर जगह कटी हुई फसल के ढेर इंतजार कर रहे हैं और जिन किसानों ने उन्हें उगाया है, वे खरीद केंद्रों, तहसील दफ़्तरों, बैंकों और ऑनलाइन पोर्टलों के बाहर फंसे हुए हैं. सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सैटेलाइट तस्वीरों, ड्रोन सर्वे और डिजिटल फ़सल मैपिंग के माध्यम से वैज्ञानिक खेती के एक नए दौर का वादा किया था.
लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर नजर आ रही है. इसको लेकर किसान सवाल पूछ रहे हैं कि अगर टेक्नोलॉजी उनके खेत में खड़ी गेहूं की फसल को पहचान ही नहीं सकती तो वह उसे बेचने के उनके अधिकार का फैसला कैसे कर सकती है?
भैरूपुरा में यह विरोधाभास गांव में कदम रखते ही साफ़ दिखाई देता है. गेहूं आंगनों में जमा है, ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर लदा है, खलिहानों में फैला है और तौले जाने का इंतज़ार कर रहा है. फिर भी सरकार के डिजिटल रिकॉर्ड में इनमें से कुछ खेत तो गेहूं के खेत हैं ही नहीं. सिस्टम ने गेहूं को चना, सरसों, टमाटर, मिर्च या यहां तक कि खाली ज़मीन के तौर पर दिखाया है. जिस फसल को किसान ने अपनी मेहनत, कर्ज और रातों की नींद हराम करके उगाया था, वह सैटेलाइट की तस्वीर में से गायब हो गई है.
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सिर्फ एक गलत एंट्री ने परिवारों को घबराहट में डाल दिया है. एक किसान के पास सॉफ़्टवेयर में सुधार होने का इंतज़ार करने की सहूलियत नहीं होती. उसे कर्ज़ चुकाना है, शादियां करवानी हैं, मज़दूरों को मज़दूरी देनी है और घर के लिए खाने का इंतज़ाम करना है. लेकिन अपनी गेहूं की फसल को तय समर्थन मूल्य पर बेचने के बजाय उसे यह साबित करने के लिए मजबूर किया जा रहा है कि जो चीज साफ-साफ गेहूं है. वह सचमुच गेहूं ही है.
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राज्य सरकार के Agri-GIS सिस्टम, जिनमें ‘SARA’ और ‘Unnati’ शामिल हैं, उन्हें एक बड़ी तकनीकी छलांग के तौर पर पेश किया गया था. सैटेलाइट तस्वीरें, ड्रोन सर्वे, खेतों की फ़ोटो, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग को फ़सल के आकलन को पारदर्शी, वैज्ञानिक और समय-सीमा के अंदर पूरा करने वाला बनाने का दावा किया गया था. सरकार का कहना है कि 5.37 करोड़ से ज़्यादा खेतों की तस्वीरों का विश्लेषण किया गया है और 3 करोड़ से ज़्यादा ज़मीन के टुकड़ों की डिजिटल मैपिंग की गई है. सरकार का दावा है कि फ़सल की पहचान की सटीकता 2022 के 66 प्रतिशत से बढ़कर 2025 तक लगभग 85 प्रतिशत हो जाएगी.
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