जगदंबिका पाल का राजनीतिक करियर 1982 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य के रूप में शुरू हुआ जहां उन्होंने 1993 तक दो कार्यकाल तक सेवा की.1988 से 1999 तक, उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया.
जगदंबिका पाल रातों-रात मुख्यमंत्री कैसे बन गए?
UP Election: उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक कहानी जिसमें एक मुख्यमंत्री सिर्फ़ 31 घंटे ही पद पर रह सका. यह घटना 1998 की है, जब BJP और BSP की मिली-जुली सरकार सत्ता में थी. कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. मायावती ने मन बना लिया था कि वह अब कल्याण सिंह की सरकार को काम नहीं करने देंगी, और उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह ऐलान किया. मुलायम सिंह यादव ने भी मायावती के बयान का समर्थन किया, और साफ़ कहा कि वह भी कल्याण सिंह सरकार को गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.
मायावती दोपहर करीब 2 बजे राजभवन पहुंचीं. उन्होंने कल्याण सिंह सरकार में ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर जगदंबिका पाल को अपनी लेजिस्लेटिव पार्टी का लीडर चुना. उन्होंने गवर्नर रोमेश भंडारी से कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करने और जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की सिफारिश की.
कल्याण सिंह इन सबसे दूर गोरखपुर में चुनाव प्रचार कर रहे थे. इसी बीच उन्हें लखनऊ से फ़ोन आया कि वहां सब कुछ गलत हो रहा है. कल्याण सिंह को इसकी जानकारी दी गई. वह अपना चुनाव प्रचार बीच में ही छोड़कर तुरंत लखनऊ के लिए निकल गए. कल्याण सिंह शाम 5 बजे लखनऊ पहुंचे. कल्याण सिंह सीधे राजभवन गए, जहां उन्होंने अपनी मेजॉरिटी साबित करने के लिए समय मांगा. हालांकि गवर्नर ने उन्हें नजरअंदाज़ कर दिया और उन्हें मेजॉरिटी साबित करने का मौका देने से मना कर दिया. ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कल्याण सिंह की सरकार गिराने का मन बना लिया हो.
मायावती से मीटिंग के बाद, गवर्नर रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया. इसके बाद जगदंबिका पाल ने रात 10:30 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह में कल्याण सिंह के सभी राजनीतिक विरोधी मौजूद थे. नरेश अग्रवाल ने जगदंबिका पाल के साथ डिप्टी मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह सब इतनी जल्दी में हुआ कि राजभवन का स्टाफ राष्ट्रगान बजाना भी भूल गया.
अगले दिन लखनऊ में लोकसभा चुनाव के लिए वोटिंग होनी थी. विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने गवर्नर के फैसले का विरोध करने के लिए स्टेट गेस्ट हाउस में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करने का फैसला किया. लखनऊ सेक्रेटेरिएट में एक अजीब स्थिति पैदा हो गई. दो लोग राज्य के मुख्यमंत्री पद का दावा कर रहे थे. स्थिति को देखते हुए BJP ने गवर्नर के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी. 22 फरवरी 1998 को बीजेपी नेता नरेंद्र सिंह गौर ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में गवर्नर के फैसले को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की. अगले दिन दोपहर 3 बजे हाई कोर्ट ने राज्य में कल्याण सिंह सरकार को बहाल करने का आदेश दिया और कल्याण सिंह सरकार को तीन दिनों के भीतर बहुमत साबित करने का निर्देश दिया. हाई कोर्ट के इस फैसले से जगदंबिका पाल को गहरा झटका लगा. उन्होंने तुरंत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. जगदंबिका पाल को 31 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा.
हाई कोर्ट ने कल्याण सिंह सरकार को तीन दिनों के भीतर विश्वास मत हासिल करने का निर्देश दिया. 25 फरवरी 1998 को सदन में फ्लोर टेस्ट हुआ. कल्याण सिंह को 225 वोट मिले, जबकि जगदंबिका पाल को 196 वोट मिले. कल्याण सिंह को सरकार बनाने के लिए 213 वोटों की ज़रूरत थी. इस तरह, कुछ ड्रामे के बाद कल्याण सिंह सरकार सत्ता में वापस आ गई.
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