UP के पूर्व CM संपूर्णानंद की प्रेरक कहानी, जो ऊंचे पदों पर रहने के बाद भी आर्थिक तंगी से जूझे. जानें कैसे राजस्थान के मुख्यमंत्री उनकी मदद के लिए वजीफा भेजते थे.
आज के दौर में किसी राज्य के मुख्यमंत्री को गरीब कहा जाए तो आपको यह अजीब लगेगा. क्योंकि आजकल के राजनेता सत्ता संभालते ही करोड़पति और अरबपति बन जाते हैं. आज राजनीति पूरी तरह से एक व्यवसाय में बदल गई है. हालांकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा भी दौर था जब लोग केवल जनता की सेवा करने के उद्देश्य से राजनीति के मैदान में उतरते थे और पूरी निष्ठा के साथ काम करते थे. राज्य के ऐसे ही एक मुख्यमंत्री थे संपूर्णानंद जिन्होंने पहले UP के शिक्षा मंत्री के रूप में फिर मुख्यमंत्री के रूप में और उसके बाद राजस्थान के राज्यपाल के रूप में सेवा की.
इतने ऊँचे पदों पर रहने के बावजूद उनके जीवन के अंतिम दिन आर्थिक तंगी से जूझते हुए बीते. उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि मोहनलाल सुखाड़िया जो उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री थे उनकी आजीविका चलाने में मदद के लिए उन्हें हर महीने कुछ आर्थिक सहायता भेजा करते थे. सुखाड़िया, संपूर्णानंद का बहुत सम्मान करते थे.
1 जनवरी 1890 को बनारस में जन्मे संपूर्णानंद ने अपनी राजनीतिक यात्रा सत्याग्रह आंदोलनों के माध्यम से शुरू की. इसके बाद वे मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हो गए. 1926 में कांग्रेस पार्टी ने उन्हें पहली बार चुनाव में उम्मीदवार बनाया और वे विजयी होकर विधानसभा में अपनी जगह बनाने में सफल रहे. 1937 में कांग्रेस मंत्रिमंडल में तत्कालीन शिक्षा मंत्री प्यारेलाल शर्मा के इस्तीफे के बाद संपूर्णानंद को उत्तर प्रदेश का शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया.
1954 में जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने UP के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया तो UP के मुख्यमंत्री का पदभार संपूर्णानंद को सौंप दिया गया. वे 1962 तक इस पद पर बने रहे. बाद में उन्हें राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया. राजस्थान के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल 1967 में समाप्त हुआ. अपना कार्यकाल पूरा होने के ठीक दो साल बाद 10 जनवरी 1969 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
हालांकि संपूर्णानंद को मुख्य रूप से एक राजनेता के रूप में याद किया जाता है, लेकिन वास्तव में वे एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे, अपने राजनीतिक जीवन के साथ-साथ उन्होंने एक विचारक, साहित्यकार, शिक्षाविद, ज्योतिषी, तांत्रिक और संपादक के रूप में भी सेवा की. उन्हें योग दर्शन में भी गहरी रुचि थी. उत्तर प्रदेश में खुली जेलें और नैनीताल में एक वेधशाला स्थापित करने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. संपूर्णानंद को हिंदी भाषा से गहरा लगाव था. लंबे समय तक उन्होंने ‘मर्यादा’ नामक पत्रिका के संपादक के रूप में कार्य किया.
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