दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह में बसंत पंचमी पर पीली चादर और सरसों के फूल चढ़ाने की परंपरा अमीर खुसरो ने अपने गुरु हजरत निजामुद्दीन औलिया का दुख दूर करने के लिए शुरू की थी, यहां कव्वाल पीले लिबास में खुसरो की रचनाएं गाकर इस सात सदियों पुरानी साझा संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) को जीवंत करेंगे.
Nizamuddin Dargah Basant Panchami 2026: यह परंपरा 13वीं सेंचुरी की है, सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया (Hazrat Nizamuddin Auliya) अपने भांजे (तकीउद्दीन नूह) के गुजर जाने के बाद गहरे गम में डूब गए थे, वे महीनों तक उदास रहे और लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया, उनके सबसे प्रिय शिष्य अमीर खुसरो अपने गुरु की यह हालत देख बेहद दुखी थे, एक दिन खुसरो ने देखा कि कुछ हिंदू महिलाएं पीले कपड़े पहनकर, हाथों में सरसों के फूल लिए गाते हुए मंदिर जा रही हैं, जब उन्होंने पूछा, तो महिलाओं ने बताया कि वे भगवान को खुश करने के लिए बसंत मना रही हैं, खुसरो को एक विचार आया उन्होंने भी पीली साड़ी पहनी, पीला साफा बांधा और सरसों के फूलों का गुच्छा लेकर अपने गुरु के पास पहुंच गए, वहां उन्होंने अपना मशहूर गीत "सकल बन फूल रही सरसों" गाया और झूमकर नाचने लगे, अपने प्रिय शिष्य का यह अनोखा रूप और निस्वार्थ प्रेम देखकर हजरत निजामुद्दीन औलिया मुस्कुरा पड़े बस, उसी दिन से दरगाह में 'सूफी बसंत' मनाने की शुरुआत हुई, जो आज भी प्यार सम्मान और हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है.
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