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क्यों जलाया जाता है पीपल पेड़ के पास दीपक? सरसो का तिल ही क्यों होता है इस्तेमल? आस्था ही नहीं विज्ञान से भी है संबंध

Peepal Tree Significance: पीपल का पेड़ पूजा पाठ के लिए क्यों खास माना जाता? और लोग पीपल के पेड़ के पास सरसो के ही तिल का दीपक क्यों जलाते हैं? क्या सच में पीपल के पेड़ में होता है पितरो का वास होता है, आइये जानते हैं सब यहां

Peepal Tree Significance: हिंदू धर्म में पीपल के पेड़ को बेहद पवित्र और देवतुल्य माना जाता है. क्योंकि शास्त्र के अनुसार, पीपल के पेड़ में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का निवास होता है और इसे ज्ञान प्राप्ति का स्थान (बोधि वृक्ष) माना जाता है. इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि पीपल के पेड़ के नीचे पितरों का निवास होता है. इसी वजह से शास्त्रों में कहा गया है कि पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना बेहद लाभदायक होता है, आइये जानते हैं कि इसके पीछे का क्या महत्व है, क्यों लोग पीपल के पेड़ के पास सरसो के ही तिल का दीपक जलाते हैं?

सालों से चल रही है पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने की परंपरा

दरअसल, भारत में कुछ ऐसा परंपराएं प्रचलित है, जिन्हे लोग एक दूसरे के देखा देखी सालों से करते आ रहे हैं, लेकिन इसके पीछे का अर्थ वो नहीं जानते हैं, इन्हीं में से एक है पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का ही दीपक जलाना की परंपरा. गाव से लेकर बड़े-बड़े शहरों तक, यह परंपरा चल रही है, लोग शनिवार या फिर अमावस्या के दिन मन में श्रद्धा  और आँखों में उम्मीद लिए पीपल के पेड़ के पास सरसों के तेल का दीपक जलाते है. यह सिर्फ उन लोगों के लिए परंपरा या फिर धार्मिक क्रिया नहीं, यह आस्था, प्रकृति और मनुष्य के बीत के गहरे संबंध को जोड़ता है. भगवद् गीता में भी लिखा गया है, जिसमें स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं कि “वृक्षों में मैं पीपल हूँ”. इसी बड़ी वजह से हिंदू धर्म को लोग पीपल को केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि देवता मानते हैं, इसकी पूजा करते हैं और इस पेड़ को कभी भी कोई हानी नहीं पहुंचाते हैं. 

पितरों से बताया गया है पीपल के पेड़ का संबंध

मान्यताओं के अनुसार पीपल के पेड़ का संबंध पितरों यानी पूर्वजों से भी जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि पीपल के पेड़ के नीचे पितरों का वास होता है. इसलिए अमावस्या, पितृपक्ष या शनिवार के दिन पीपल के पेड के नीचे दिया जलाया जाता है, यह अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का तरीका होता है. धार्मिक विश्वास के अनुसार, पीपल के पेड के नीचे दिया जलाने से कुंडली में पितृदोष शांत होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। ग्रहों की दृष्टि से देखा जाए तो, पीपल के पेड़ को शनि देव से जोड़ा जाता है, जो कर्म, न्याय और अनुशासन के देवता है. जिन लोगों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही होती है या फर पितृ दोश होता है, उन्हे, ज्योतिषों के सलाह से पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने के लिए कहा जाता है. मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से शनि की क्रूर दृष्टि का प्रभाव कम होता है, व्यक्ति को मानसिक बल मिलता है।

पीपल के पेड़ के नीचे सिर्फ सरसों का तेल ही दीपक क्यों जलाया जाता है?

अब सवाल उठता है कि पीपल के पेड़ के नीचे सिर्फ सरसों का तेल ही दीपक क्यों जलाया जाता है? इसके पीछे आध्यात्मिक प्रतीक, ज्योतिषीय मान्यता, व्यवहारिक कारण और सूक्ष्म वैज्ञानिक सोच है. 

आध्यात्मिक प्रतीक दृष्टिकोण: सरसों का तेल भारी होता है और धीमी गति से जलता है, जिससे दिया भी देर तक जलता रहता है। प्रतीकात्मक रूप से जाने तो यह धैर्य, निरंतरता और स्थिरता का संकेत देता है। साथ ही, सरसों के तेल वातावरण में मौजूद की गंध और कीटाणुओं का खत्म करता है.

व्यावहारिक दृष्टिकोण: पुराने समय में सरसों का तेल आसानी से हर जगह मिल जाता था. साथ ही यह बेहद सस्ता होता था और रोजमरा के कामों में इस्तेमाल होता था. इसलिए लोगो खुले स्थानों पर, जैसे पीपल के पेड़ के नीचे, सरसों के तेल का दीपक जलाते थे. भारी होने की वजह से सरसों के तेल का दीपक हवा में भी अपेक्षाकृत स्थिर रहता है। इसलिए लोग मंदिरों और पेड़ों के नीचे दीपक जलाने के लिए सरसों के तेल का इस्तेमाल करते थे.

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: पीपल के पेड़ के नीचे सिर्फ सरसों का तेल का दीपक की परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो कई रोचक तथ्य सामने आते हैं। पीपल का पेड़ उन गिने-चुने पेड़ों में से है, जो रात में भी ऑक्सीजन देता है और अपने आस-पास के वातावरण को शुद्ध रखता है. इतना ही नहीं पीपल के पेड़ के नीचे बैठने से ठंडक, ताजगी और मानसिक शांति का भी अनुभव होता है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति ऐसे शांत वातावरण में दिया जलाता है, तो उसका ध्यान केंद्रित रहता है, क्योंकि जब हम दीपक में तेल भरते हैं, बाती लगाते हैं और आग जलाते हैं, तब हम कुछ पलों के लिए चिंताओं से मुक्त हो जाते है. पीपल के पेड़ के पास की गई यह प्रक्रिया भी ऐसी ही प्रभावशाली होती है, जिसे विज्ञान की भाषा में माइंडफुलनेस कहते है,  यही वजह है कि सदियों के बाद भी यह परंपरा लोगों के बीच जीवित है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

Chhaya Sharma

छाया शर्मा (Chhaya Sharma) को एंटरटेनमेंट न्यूज़, लाइफस्टाइल और एस्ट्रोलॉजी में काम करते हुए 9 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इनके द्वारा दी गई जानकारी व्यूअर्स को जागरूक करने और उन तक लेटेस्ट न्यूज़ पहुंचाने का काम करती है। ये अपनी ईमानदारी और स्पष्टता के साथ लोगों की सहायता करने में माहिर हैं। छाया से संपर्क करने के लिए chhaya.sharma@itvnetwork.com पर संपर्क किया जा

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