AI से जुड़ी नौकरियों पर बहस के बीच ज़ोहो संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने कहा कि असली सुरक्षित काम वे हैं जो इंसानी जुड़ाव, देखभाल और मकसद से प्रेरित होते हैं.
AI Job Fear: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर दुनिया भर में बहस तेज़ है कि क्या AI नौकरियां खत्म करेगा या नए अवसर बनाएगा? इसी चर्चा के बीच ज़ोहो के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने X पर एक लंबी पोस्ट में अलग नजरिया पेश किया है. उन्होंने “सेफ जॉब्स” की पारंपरिक लिस्ट देने के बजाय उन कामों की बात की जो मकसद, देखभाल और समुदाय से जुड़े हैं.
वेम्बू का कहना है कि अगर इंसान अपनी वैल्यू को सिर्फ़ सैलरी या इंटेलेक्चुअल स्टेटस से जोड़ता है, तो AI के दौर में उसे पहचान का संकट हो सकता है. जैसे-जैसे मशीनें व्हाइट-कॉलर कामों में बेहतर होंगी, कई प्रतिष्ठित पेशों की विशिष्टता कम हो सकती है.
वेम्बू ने जिन कामों को अपेक्षाकृत “AI-प्रूफ” बताया, उनमें बच्चों की देखभाल, युवाओं को पढ़ाना, बुज़ुर्गों की सेवा, खेती, फॉरेस्ट रेंजर की भूमिका, मंदिर पुजारी, और क्लासिकल संगीतकार शामिल हैं. उनके अनुसार, ये पेशे पैसे से अधिक उद्देश्य से प्रेरित होते हैं.
उनका तर्क है कि जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी प्रोडक्टिविटी-ड्रिवन नौकरियों को संभालेगी, इंसान ऐसे कामों की ओर लौट सकते हैं जिनमें संवेदना, संस्कृति और मानवीय जुड़ाव अहम हो.
वेम्बू के विचारों पर X यूजर विष्णु अग्रवाल ने सवाल उठाया. उन्होंने तर्क दिया कि कला और संस्कृति तभी फलती-फूलती हैं जब अर्थव्यवस्था मजबूत हो. उदाहरण के तौर पर उन्होंने रेनेसां फ्लोरेंस का हवाला दिया, जहां कला को अमीर परिवारों का समर्थन मिला.
जवाब में वेम्बू ने कहा कि AI प्रोडक्टिविटी बढ़ाकर सामान और सेवाओं की भरमार कर सकता है. असली सवाल यह होगा कि इस सरप्लस का वितरण कैसे होगा. उन्होंने प्राचीन मंदिरों का उदाहरण दिया, जिन्हें हजारों कारीगरों ने बनाया और जिनका पोषण सामाजिक सरप्लस से हुआ.
US-सऊदी इन्वेस्टमेंट फोरम में Elon Musk ने भविष्य की ऐसी दुनिया की कल्पना की, जहां काम वैकल्पिक हो जाएगा और AI मानव श्रम की जगह ले लेगा. उन्होंने टेस्ला के ह्यूमनॉइड रोबोट ऑप्टिमस का भी जिक्र किया. वहीं Jensen Huang ने संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि AI काम करने के तरीके बदलेगा, लेकिन इससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी जरूरी नहीं है.
वेम्बू के मुताबिक, असली मुद्दा नौकरियों का नहीं, बल्कि राजनीतिक अर्थव्यवस्था का है. जब टेक्नोलॉजी पारंपरिक रोजगार के बिना सरप्लस बनाएगी, तो समाज को तय करना होगा कि उस समृद्धि को कैसे बांटा जाए. AI के इस युग में सवाल सिर्फ “कौन-सी नौकरी सुरक्षित है” नहीं, बल्कि “हम अपनी वैल्यू किससे तय करते हैं” भी है.
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