RPF Story: रेलवे की भीड़ में अनदेखे रह जाने वाले मासूम चेहरों को इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा ने पहचान दी. तीन साल में उन्होंने यूपी के स्टेशनों पर 1,500 से ज्यादा बच्चों को सुरक्षित बचाया.
RPF Story: रेलवे स्टेशन की भीड़ में रोज़ हज़ारों चेहरे आते-जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें कोई नहीं देखता. रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) की इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा (Chandana Sinha) उन चंद अधिकारियों में हैं, जिन्होंने पिछले तीन वर्षों में ऐसे ही अनदेखे चेहरों डरे हुए, सहमे बच्चों को पहचानने और बचाने का काम किया है. उत्तर प्रदेश के रेल नेटवर्क पर तैनाती के दौरान उन्होंने 1,500 से अधिक बच्चों को तस्करी और शोषण के जाल में फंसने से पहले सुरक्षित निकाला.
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पली-बढ़ी चंदना सिन्हा 11 साल की बेटी की मां हैं. 1980 के दशक की टीवी सीरीज़ उड़ान से प्रेरित होकर उन्होंने वर्ष 2010 में RPF जॉइन की. लाइमलाइट से दूर रहकर वे आज भी प्लेटफॉर्म पर लौट आती हैं क्योंकि उनके लिए वर्दी सिर्फ़ नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी है. चंदना के पिता भी एक सरकारी कर्मचारी थे.
लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर काम करते हुए सिन्हा ने रूटीन पेट्रोलिंग से आगे बढ़कर “देखने” का तरीका विकसित किया. बॉडी लैंग्वेज, डर भरी आंखें, असहज चुप्पी और बच्चे व साथ मौजूद वयस्क के बीच बेमेल ये संकेत उनके लिए अलार्म बन जाते हैं. उन्होंने अपनी टीम को भी यही सिखाया कि खतरा अक्सर शोर में नहीं, खामोशी में छिपा होता है.
जून 2024 में उन्हें भारतीय रेलवे की बाल बचाव पहल ‘ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते’ का नेतृत्व सौंपा गया. इसके तहत उनकी टीम, जिसमें अधिकतर महिला अधिकारी हैं, उन्होंने बिहार, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों की ओर जाने वाले तस्करी मार्गों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया. ज़्यादातर बच्चे 13 से 15 साल के थे, जिन्हें काम का झांसा देकर अजनबियों के साथ भेजा जा रहा था.
9 जनवरी को दिल्ली में आयोजित समारोह में चंदना सिन्हा को भारतीय रेलवे का सर्वोच्च सेवा सम्मान ‘अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार’ मिला. यह सम्मान किसी एक साहसिक ऑपरेशन के लिए नहीं, बल्कि वर्षों में विकसित की गई उस संवेदनशील कार्यप्रणाली के लिए दिया गया, जो चुपचाप ज़िंदगियां बचाती है.
बचाव के बाद सबसे कठिन काम होता है भरोसा लौटाना. कई बच्चे बोलने से डरते हैं, कुछ रटी-रटाई कहानियां दोहराते हैं. एक 15 वर्षीय लड़की को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में घंटों लगे, क्योंकि उसके पास लौटने के लिए कोई स्पष्ट रास्ता नहीं था. कई बार माता-पिता भी सामाजिक डर के कारण केस दर्ज न करने की गुहार लगाते हैं, ऐसे में परिवार की काउंसलिंग भी ज़रूरी हो जाती है.
वर्ष 2025 में अब तक सिन्हा की टीम 1,032 बच्चों को बचा चुकी है, जिनमें मज़दूरी के लिए तस्करी किए गए बच्चे और एक छह साल की बच्ची भी शामिल है. वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि उनके काम ने RPF की कार्यसंस्कृति को बदला है.
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