Brahmakapal Tirtha Pind Daan: श्राद्धपक्ष की शुरुआत के साथ ही बद्रीनाथ स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ में पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है. खराब मौसम और बारिश के बावजूद दिल्ली, दक्षिण भारत, नेपाल, राजस्थान और बंगाल समेत कई जगहों से लोग यहां पहुंचे. धार्मिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए श्राद्धपक्ष के दौरान इस तीर्थ का विशेष महत्व माना जाता है.
श्राद्धपक्ष शुरू होते ही बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में उमड़ी भीड़
Brahmakapal Tirtha Pind Daan: श्राद्धपक्ष की शुरुआत के साथ ही उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ में पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है. खराब मौसम और बारिश के बावजूद देश के अलग अलग हिस्सों से लोग यहां पहुंच रहे हैं. श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मशांति और मोक्ष की कामना के साथ अलकनंदा नदी के किनारे स्थित ब्रह्मकपाल में श्राद्ध कर्म करते नजर आए. स्थानीय तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक, श्राद्धपक्ष के पहले दिन ही हजारों श्रद्धालुओं ने पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान किया.
बद्रीनाथ मंदिर से करीब 200 मीटर की दूरी पर अलकनंदा नदी के किनारे ब्रह्मकपाल तीर्थ स्थित है. श्राद्धपक्ष शुरू होते ही यहां सुबह से ही पितृ तर्पण और पिंडदान का सिलसिला शुरू हो गया. दिल्ली, दक्षिण भारत, नेपाल, राजस्थान और बंगाल समेत देश के अलग अलग हिस्सों से श्रद्धालु बद्रीनाथ पहुंचे. बारिश और खराब मौसम के बावजूद लोगों की आस्था कम नहीं हुई और श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान करते नजर आए.
धार्मिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसी वजह से बद्रीनाथ धाम को मोक्ष धाम भी कहा जाता है. ब्रह्मकपाल को कपाल मोचन तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है. श्राद्धपक्ष के दौरान यहां पितरों के निमित्त किए जाने वाले तर्पण और पिंडदान को विशेष महत्व दिया जाता है.
ब्रह्मकपाल से जुड़ी पौराणिक मान्यता भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा से संबंधित है. मान्यता है कि भगवान शिव ने क्रोधित होकर भगवान ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था. ब्रह्मा का वह सिर भगवान शिव के त्रिशूल से चिपक गया. इसके बाद ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव तीनों लोकों में विचरण करते रहे. धार्मिक मान्यता के मुताबिक, जब भगवान शिव बद्रीनाथ धाम स्थित ब्रह्मकपाल पहुंचे तो ब्रह्मा का सिर उनके त्रिशूल से अलग हो गया. इसी मान्यता के कारण इस स्थान का नाम ब्रह्मकपाल और कपाल मोचन तीर्थ पड़ा. पितरों के मोक्ष से जुड़ी मान्यताओं के कारण यहां श्राद्ध और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है.
श्राद्ध कर्म के दौरान पिंडदान के लिए चावल, जौ और काले तिल का इस्तेमाल किया जाता है. धार्मिक परंपरा के अनुसार, श्राद्धपक्ष में पितरों के निमित्त भोजन अर्पित करने के साथ गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा भी है. चावल की खीर को भी श्राद्ध कर्म में विशेष महत्व दिया जाता है.
तीर्थ पुरोहित संजय हटवाल और हरीश सती के अनुसार, गया और काशी समेत देश के कई प्रमुख तीर्थों में पिंडदान की परंपरा है. हालांकि ब्रह्मकपाल को पितृ पूजन के लिए विशेष महत्व वाला तीर्थ माना जाता है. श्राद्धपक्ष के दौरान देश के अलग अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां अपने पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने पहुंचते हैं. आस्था के इसी केंद्र के चलते श्राद्धपक्ष शुरू होते ही ब्रह्मकपाल में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई है.
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