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कजरी तीज 30 या 31 अगस्त को? पंचांग से दूर करें तारीख का कन्फ्यूजन, जानें व्रत और चंद्रोदय का सही समय

Kajari Teej date: पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 30 अगस्त 2026 की रात 9:39 बजे शुरू होकर 31 अगस्त की रात 8:53 बजे समाप्त होगी. उदया तिथि के आधार पर कजरी तीज का व्रत 31 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जाएगा. इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख की कामना से व्रत रखती हैं और भगवान शिव-माता पार्वती की पूजा करती हैं. चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने की भी परंपरा है.

Kajari Teej date: हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का पर्व मनाया जाता है. सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना से इस दिन व्रत रखती हैं. वहीं, कई जगहों पर कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं. कजरी तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. इस बार कजरी तीज की तारीख को लेकर लोगों में असमंजस है. कोई 30 अगस्त तो कोई 31 अगस्त को कजरी तीज बता रहा है. ऐसे में पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि और उदया तिथि के नियम से इसकी सही तारीख समझी जा सकती है.

पंचांग के अनुसार 31 अगस्त को रखा जाएगा व्रत

पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 30 अगस्त 2026 की रात 9 बजकर 39 मिनट से शुरू होगी. यह तिथि 31 अगस्त 2026 की रात 8 बजकर 53 मिनट तक रहेगी. क्योंकि 31 अगस्त को सूर्योदय के समय तृतीया तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए उदया तिथि की मान्यता के अनुसार कजरी तीज का व्रत 31 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जाएगा. यही वजह है कि 30 और 31 अगस्त को लेकर जो भ्रम बना हुआ है, उसमें पंचांग के आधार पर 31 अगस्त की तारीख को कजरी तीज के लिए मानना उचित माना जाता है.

पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख के लिए रखा जाता है व्रत

कजरी तीज का व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. महिलाएं पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से व्रत करती हैं. कई क्षेत्रों में कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को करती हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार वे अच्छे और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं. पूजा के दौरान शिव-पार्वती से परिवार की सुख-शांति, दांपत्य जीवन में प्रेम और मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना की जाती है.

कजरी तीज पर शिव-पार्वती की पूजा का विधान

कजरी तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष महत्व बताया गया है. पूजा में भगवान शिव को बेलपत्र, चंदन, धूप, दीप, फल और फूल अर्पित किए जा सकते हैं. माता पार्वती को अपनी परंपरा के अनुसार श्रृंगार की सामग्री अर्पित की जाती है. भगवान शिव को दूध से बनी मिठाई, खीर या सफेद मिठाई का भोग लगाया जा सकता है. पूजा के बाद शिव-पार्वती के मंत्रों का जाप और कजरी तीज की व्रत कथा का श्रवण किया जाता है.

कुछ जगह नीम की टहनी और मिट्टी के तालाब की होती है पूजा

कजरी तीज की पूजा की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती हैं. कुछ घरों में इस दिन मिट्टी या गोबर से छोटे तालाब जैसी आकृति बनाई जाती है. इसके पास नीम की टहनी लगाई जाती है. इसके बाद उस आकृति में जल और कच्चा दूध डालकर दीपक जलाने की परंपरा भी कुछ क्षेत्रों में देखने को मिलती है. हालांकि, यह विधि सभी जगह अनिवार्य नहीं है. पूजा अपने परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार की जा सकती है.

चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को दिया जाता है अर्घ्य

कजरी तीज के व्रत में चंद्रमा की पूजा का भी महत्व माना जाता है. व्रत रखने वाली महिलाएं चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं. इसके लिए जल में थोड़ा दूध मिलाया जा सकता है. इसके बाद दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाकर चंद्र देव को अर्घ्य देने की परंपरा है. चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य के बाद भगवान शिव को अर्पित किए गए फल आदि ग्रहण करके व्रत खोला जा सकता है. हालांकि, व्रत खोलने की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अलग हो सकती है.

कजरी तीज पर दान का भी है महत्व

धार्मिक परंपरा के अनुसार कजरी तीज के दिन सामर्थ्य के अनुसार दान करना शुभ माना जाता है. व्रत और पूजा के बाद सुहाग सामग्री, दूध, दही, मिश्री, खाद्य सामग्री या धन का दान किया जा सकता है. दान करते समय अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा का ध्यान रखना चाहिए. धार्मिक कर्मकांड में किसी एक विधि को सभी के लिए अनिवार्य मानने के बजाय स्थानीय परंपरा का पालन किया जा सकता है.

उत्तर भारत में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है कजरी तीज

कजरी तीज मुख्य रूप से उत्तर भारत के कई हिस्सों में मनाई जाती है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार समेत विभिन्न क्षेत्रों में इस पर्व से जुड़ी अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं. कुछ स्थानों पर इसे बूढ़ी तीज, सातुड़ी तीज या नीमड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है. नाम और पूजा की विधि क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है, लेकिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा तथा दांपत्य सुख की कामना इस पर्व की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है.

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