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ऋषि पराशर का अद्भुत वरदान, जब मछुआरे की बेटी को बना दिया सुगंधित, फिर भी रह गई कुंवारी!

Mahabharat Story: महाभारत में कई ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें आज के समय में समझ पाना या उनके पीछे के विज्ञान को समझ पाना आसान नहीं है। ऐसी ही एक कहानी ऋषि पराशर से जुड़ी है।

BY: Preeti Pandey • UPDATED :
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India News (इंडिया न्यूज),Mahabharat Story: महाभारत में कई ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें आज के समय में समझ पाना या उनके पीछे के विज्ञान को समझ पाना आसान नहीं है। ऐसी ही एक कहानी ऋषि पराशर से जुड़ी है, जो एक मछुआरे की बेटी की खूबसूरती पर इस कदर मोहित हो गए थे कि उससे मिलने के लिए उन्होंने दिन को रात में बदल दिया। इतना ही नहीं, वे इस लड़की की खूबसूरती पर इतने मोहित हो गए थे कि उसके साथ यौन संबंध बनाने के बाद उन्होंने उसे फिर से ‘कुंवारी’ होने का आशीर्वाद दिया। यह कहानी ‘महाभारत’ के जन्म की कहानी भी है। आइए आपको बताते हैं इस कहानी के बारे में।

मत्स्यगंधा के सुन्दर मुख पर ऋषि मोहित हो गए

महान् ऋषि पराशर तीर्थ यात्रा पर थे। घूमते-घूमते वे यमुना के पावन तट पर आए और एक मछुआरे से नदी पार ले चलने को कहा। उस समय मछुआरा भोजन कर रहा था, इसलिए उसने अपनी पुत्री मत्स्यगंधा से ऋषि को नदी पार ले चलने को कहा। मत्स्यगंधा ने ऋषि को नाव में बैठाया और नदी पार ले जाने लगी। जैसे ही ऋषि पराशर की दृष्टि मत्स्यगंधा के सुन्दर मुख पर पड़ी, उन्हें कामवासना उत्पन्न हो गई और उन्होंने मत्स्यगंधा से अपनी इच्छा प्रकट की।

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Mahabharat Story: ऋषि पराशर का अद्भुत वरदान

मत्स्यगंधा ने सोचा, ‘यदि मैं ऋषि की इच्छा के विरुद्ध कुछ करूंगी, तो वे मुझे श्राप दे सकते हैं।’ अतः उसने चतुराई से कहा – हे ऋषिवर! मेरे शरीर से मछली की गंध आ रही है। मुझे देखकर आपको कामवासना कैसे उत्पन्न हो गई?’ ऋषि चुप रहे, तब मत्स्यगंधा बोली, ‘मुनिवर! मुझसे दुर्गंध आ रही है। सुख तभी प्राप्त होता है, जब दोनों एक ही हों।

अभी दिन है’ सुनते ही यमुना के तट पर रात हो गई

पराशर ऋषि ने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से मत्स्यगंधा को कस्तूरी की तरह सुगन्धित कर दिया और उसका नाम सत्यवती रखा। ऐसी स्थिति में सत्यवती ने उन्हें याद दिलाया कि ‘अभी दिन है’ इसलिए उनका मिलन संभव नहीं है। लेकिन तभी पराशर मुनि ने अपने पुण्य के प्रभाव से कोहरा उत्पन्न कर दिया, जिससे तटों पर अंधकार छा गया। ऐसा लगने लगा कि जैसे दिन में ही रात हो गई हो।

लेकिन सत्यवती एक लड़की थी और वह जानती थी कि यह ठीक नहीं है। उसने कोमल स्वर में प्रार्थना की – “प्रिये! मैं एक कुंवारी लड़की हूँ। यदि मैं तुम्हारे संभोग से माँ बन गई, तो मेरा जीवन नष्ट हो जाएगा।” यह सुनकर पराशर मुनि ने कहा, ‘प्रिये! मेरे यह कार्य करने के बाद भी तुम कुंवारी ही रहोगी। तुम्हारा कौमार्य भंग नहीं होगा।’ पराशर ऋषि अपनी इच्छा पूरी करके सत्यवती को लेकर चले गए।

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महर्षि वेदव्यास और ‘महाभारत’ का जन्म

दूसरी ओर, सत्यवती ने यमुना के एक छोटे से द्वीप पर अपने पुत्र को जन्म दिया। बालक जन्म से ही काला था, इसलिए उसका नाम ‘कृष्ण’ रखा गया और द्वीप पर जन्म लेने के कारण उसे कृष्ण द्वैपायन कहा गया। सत्यवती और ऋषि पराशर के यह प्रतापी पुत्र महर्षि वेदव्यास ही हैं। आगे चलकर कृष्ण द्वैपायन ने तपस्या आरंभ की और द्वापर युग के अंतिम चरण में उन्होंने वेदों का संपादन आरंभ किया।

वेदों का विस्तार करने के कारण ही वे ‘वेदव्यास’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। महर्षि वेदव्यास ने एक महान महाकाव्य की रचना की, जो बाद में ‘महाभारत’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरी ओर, अपने पुत्र को द्वीप पर छोड़कर सत्यवती पुनः कुंवारी की तरह रहने लगी और इस सत्यवती की सुगंध से राजा शांतनु मोहित हो गए। सत्यवती और शांतनु के चले जाने के बाद राजा शांतनु के बड़े पुत्र भीष्म ने ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ ली।

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