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IIT Story: आईआईटी बॉम्बे का कमाल, गिरे पत्तों से बन रहा ईंधन, घट रही LPG पर निर्भरता

LPG बढ़ती कीमतों के बीच IIT बॉम्बे ने गिरे पत्तों को ईंधन में बदलकर मिसाल पेश की है, जहां कचरा अब पर्यावरण हितैषी और सस्ता ऊर्जा स्रोत बन चुका है.

IIT Story: बढ़ती LPG कीमतों और एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर चिंता के बीच एक दिलचस्प और प्रैक्टिकल समाधान सामने आया है. IIT बॉम्बे के हरे-भरे कैंपस में गिरे हुए पत्तों को अब कचरा नहीं, बल्कि एक उपयोगी ईंधन के रूप में देखा जा रहा है. यह पहल न सिर्फ पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि लागत बचत का भी बेहतरीन उदाहरण बन चुकी है.

IIT बॉम्बे के विशाल परिसर में रोज़ाना 2-3 टन पत्तों का कचरा निकलता है. पहले इस कचरे को हटाना एक चुनौतीपूर्ण और खर्चीला काम था. लेकिन शोधकर्ताओं ने इसमें संभावनाएं देखीं. प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में एक दशक पहले शुरू हुआ यह प्रयोग आज एक सफल मॉडल बन चुका है.

बायोमास गैसीफिकेशन: कचरे से ईंधन तक का सफर

इस प्रक्रिया में सूखे पत्तों को छोटे-छोटे पेलेट्स में बदला जाता है, जिन्हें बायोमास गैसीफिकेशन तकनीक के जरिए ईंधन में परिवर्तित किया जाता है. शुरुआत में कई तकनीकी समस्याएं आईं जैसे अधिक धुआं, मशीनों का रुकना और गैस की अस्थिर गुणवत्ता. लेकिन लगातार सुधार और रिसर्च के बाद टीम ने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया, जो साफ और स्थिर गैस प्रोडक्शन में सक्षम है.

तकनीक से ज्यादा बड़ी थी इंसानी चुनौती

नई तकनीक को अपनाने में रसोई स्टाफ की हिचकिचाहट भी एक बड़ी बाधा थी. शुरुआत में उन्हें इस सिस्टम पर भरोसा नहीं था. लेकिन शोधकर्ताओं ने धैर्य के साथ उनकी समस्याएं समझीं, सुझावों को शामिल किया और सिस्टम को उपयोग में आसान बनाया. धीरे-धीरे यह भरोसा जीतने में कामयाब रहा.

रसोई में दिख रहा असली असर

आज यह सिस्टम IIT बॉम्बे की एक कैंटीन में सफलतापूर्वक चल रहा है. यह रोज़ाना एक LPG सिलेंडर की बचत कर रहा है, जिससे कुल खपत में 40-50% की कमी आई है. गैसीफायर से बनने वाली भाप का इस्तेमाल सीधे खाना पकाने में किया जाता है, जिससे प्रक्रिया और भी प्रभावी बनती है.

पर्यावरण और लागत दोनों में फायदा

इस पहल से न सिर्फ कचरा प्रबंधन आसान हुआ है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आई है. अनुमान है कि बड़े स्तर पर इसे लागू करने से हर साल लाखों रुपये की बचत और भारी मात्रा में LPG की खपत कम की जा सकती है.

भविष्य की दिशा

हालांकि अभी यह सिस्टम LPG के साथ मिलकर काम कर रहा है, लेकिन भविष्य में पूरी तरह इस पर निर्भर होना संभव है. इसके लिए रसोई के बुनियादी ढांचे में बदलाव जरूरी होगा. अब इस तकनीक को लाइसेंस भी मिल चुका है, जिससे इसे अन्य संस्थानों और शहरों में भी अपनाया जा सकेगा. 

Munna Kumar

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