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‘ओ बेटा जी’…..के अभिनेता भगवान दादा की नरम-गरम किस्मत, कभी थे 7 लग्जरी कारों के मालिक, छोटी-सी चॉल में काटा अंतिम समय

भगवान दादा, हिंदी सिनेमा के पहले एक्शन और डांसिंग स्टार थे. 1940-50 के दशक में वे सुपरस्टार बने, 25 कमरों का आलीशान बंगला और 7 लग्जरी कारें खरीदीं. राज कपूर उन्हें 'देसी डगलस' कहते थे.

आप सभी ने ‘ओ बेटा जी, किस्मत की हवा, कभी नरम, कभी गरम’ तो सुना ही होगा, ऐसा ही कुछ हुआ था इस गाने में अभिनय करने वाले भगवान दादा के भी साथ. भगवान दादा, हिंदी सिनेमा के पहले एक्शन और डांसिंग स्टार थे. वो एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने चॉल से अर्श तक का सफर तय किया, लेकिन किस्मत ने फिर उन्हें फिर फर्श पर ला पटका. उनका जीवन संघर्ष, सफलता और पतन की अनोखी दास्तान है.
4 फरवरी, 2002 को उनका निधन हो गया था. आज उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं, उनसे जुड़े कुछ खास किस्से!

प्रारंभिक जीवन

भगवान दादा का असली नाम भगवान आभाजी पालव था. उनका जन्म 1 अगस्त 1913 को अमरावती, महाराष्ट्र में एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था. गरीबी के कारण वे छोटी उम्र में ही मुंबई आ गए और चॉल में रहते हुए मजदूरी करने लगे थे. सिनेमा का शौक उन्हें फिल्म स्टूडियो तक खींच ले गया, जहां वे पहले एक्स्ट्रा आर्टिस्ट बने. मूक फिल्मों के दौर में उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम शुरू किया और जल्दी ही अपनी स्टंट स्किल्स से पहचान बना ली. हॉलीवुड स्टार डगलस फेयरबैंक्स के फैन भगवान ने मुक्कों वाली रियल फाइट सीन शुरू किए, जो हिंदी सिनेमा में एक क्रांतिकारी प्रयोग था. 

सिनेमा में उदय

1930 के दशक में भगवान दादा ने कई मूक फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए. उनकी पहली बोलती फिल्म 1938 में आई ‘हिम्मत ए मर्दा’ थी, जिसमें ललिता पवार हीरोइन थीं. लेकिन असली धमाल 1951 में आई फिल्म ‘अलबेला’ ने मचाया था. इस फिल्म के गाने ‘शोला जो भड़के’ और ‘ओ बेटा जी’ आज भी लोकप्रिय हैं. फिल्म ने उन्हें बेशुमार शोहरत और दौलत दी, जो अफ्रीका तक लोकप्रिय हुई थी. भगवान कम बजट की एक्शन-कॉमेडी फिल्में बनाते, खुद स्टंट करते और डायरेक्शन भी संभालते. उन्होंने भारत की पहली हॉरर फिल्म ‘भेड़िया बंगला’ भी बनाई, जो हिट रही थी. 1940-50 के दशक में वे सुपरस्टार बने, चेंबूर में जागृति स्टूडियो खोला, 25 कमरों का आलीशान बंगला और 7 लग्जरी कारें खरीदीं. राज कपूर उन्हें ‘देसी डगलस’ कहते थे.

प्रमुख उपलब्धियां

भगवान ने 400 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. वे पहले एक्शन हीरो, डांसिंग स्टार और कॉमेडियन थे. उनकी फिल्मों में रियलिज्म था- एक सीन में तो उन्होंने असली नोट उड़ाए थे. भगवान दादा फिल्मों में बिना बाडी डबल के स्टंट हमेशा खुद करते थे. मजदूर वर्ग उनकी फिल्मों का दीवाना था.

पतन का दौर

भगवान दादा सफलता की सीढ़ियां चढ़ते ही जा रहे थे, कि अचानक ऐसा हुआ मानो उनकी सफलता को किसी की बुरी नजर लग गयी. उनकी सफलता का दौर लंबा न रहा. 1960 के दशक में ‘हंसते रहो’ जैसी महंगी फिल्म फ्लॉप हो गई. इस फिल्म के लिए उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी थी, पत्नी के जेवर तक गिरवी रख दिए थे. उनका स्टूडियो बिक गया, बंगला चला गया. सिनेमा बदला, नए हीरो आए, भगवान के स्टाइल का जमाना लद गया. एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में उन्होंने फिल्म सेट पर ललिता पवार को थप्पड़ मार दिया, जिससे उनकी एक आंख खराब हो गई. इस घटना से वे जीवनभर अपराधबोध से ग्रस्त रहे. 1970-80 के दशक में वे कैरेक्टर रोल्स तक सीमित हो गए और आखिर में दो कमरों वाली चॉल में रहने लगे.
भगवान दादा का निधन 4 फरवरी 2002 को हुआ. उनके बेटे गौरीकांत ने ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ जैसी फिल्मों में काम किया है. भगवान दादा ने हिंदी सिनेमा को एक्शन, डांस और कॉमेडी की नई परिभाषा दी. आज भी उनके गाने याद किए जाते हैं.

Shivangi Shukla

वर्तमान में शिवांगी शुक्ला इंडिया न्यूज़ के साथ कार्यरत हैं. हेल्थ, बॉलीवुड और लाइफ़स्टाइल विषयों पर लेखन में उन्हें विशेष रुचि और अनुभव है. इसके अलावा रिसर्च बेस्ड आर्टिकल और पॉलिटिकल कवरेज से जुड़े मुद्दों पर भी वे नियमित रूप से लेखन करती हैं. तथ्यपरक, सरल और पाठकों को जागरूक करने वाला कंटेंट तैयार करना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है. डिजिटल मीडिया में विश्वसनीय और प्रभावी पत्रकारिता को लेकर वे निरंतर अभ्यासरत हैं.

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