भोजपुरी इंडस्ट्री में 'मरद छक्का मिलल बा' गाने ने क्यों छेड़ी नई बहस? क्या व्यूज के लिए गिरता जा रहा है संगीत का स्तर? जानिए इस वायरल गाने के पीछे का पूरा सच.
भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री में इन दिनों ‘व्यूज’ की अंधी दौड़ में भाषाई गरिमा को ताक पर रख दिया गया है। हाल ही में रिलीज हुआ गाना ‘मरद छक्का मिलल बा’ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. SFC म्यूजिक पर रिलीज यह गाना द्विअर्थी (Double Meaning) बोलों के कारण चर्चा में है। भोजपुरी इंडस्ट्री में मनोरंजन के नाम पर किसी की शारीरिक अक्षमता का उपहास उड़ाना और फूहड़ शब्दों का सहारा लेना अब एक ट्रेंड बन चुका है और यह एकमात्र उदाहरण नहीं है हम आपके सामने ऐसे कई उदाहरण पेश कर सकते हैं और हैरत की बात यह है कि ऐसे गानों को समाज में बड़े चाव से सुना जा रहा है, क्योंकि इस गाने के रिलीज होते हुए व्यूज मिलियन में पहुंच गए. जो न केवल हमारी समृद्ध संस्कृति को धूमिल कर रहे हैं बल्कि नई पीढ़ी को भी गलत संदेश दे रहे हैं. यह संगीत की प्रगति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पतन है.
इस गाने में रिया प्रजापति और शिवम यादव की जोड़ी है. रिया प्रजापति अपने एक्सप्रेशंस और डांस मूव्स हैं, वहीं शिवम यादव भी एक ट्रांसजेंडर का किरदार निभा रहे हैं. इस गाने को भोजपुरी सिंगर गोल्डी यादव ने गाया है. गाने के बोल गौतम राय ने लिखे हैं. जिसमें लड़की कहती है कि मेरा पति छक्का (ट्रांसजेंडर) मिला है. अभिराम पांडे ने संगीत दिया है. इस गाने को दिनेश दिलावर और डी.के. सिंह ने डायरेक्ट किया है. कोरियोग्राफर रोबोट (संदीप) ने डांस स्टेप्स तैयार किया है.
यह पहली बार नहीं है जब भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री अपनी मर्यादा को लेकर कटघरे में खड़ी है. समय-समय पर ऐसे गानों को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं. इससे पहले भी ‘पांडे जी का बेटा हूं’, ‘हैलो कौन’ के कुछ विवादित वर्जन या ‘राते दिया बुताके’ जैसे गानों ने अपनी द्विअर्थी शब्दावली के कारण खूब सुर्खियां बटोरीं और आलोचना झेली.
यदि हम आज के दौर की तुलना पुराने भोजपुरी संगीत से करें, तो एक गहरा अंतर साफ नजर आता है। एक दौर था जब भोजपुरी संगीत का अर्थ पद्मश्री शारदा सिन्हा के सुरीले लोकगीत, महेंद्र मिसिर की पूरबी और भिखारी ठाकुर के सामाजिक संदेशों से सराबोर ‘बिदेसिया’ नाटक हुआ करते थे। उस समय के गानों में ‘प्रीत’, ‘मजाक’ और ‘देवर-भाभी के रिश्तों’ में एक मिठास और शालीनता होती थी. लोकगीतों में खेतों की खुशबू और मिट्टी का सोंधापन होता था न कि आज जैसा मशीनी शोर और भद्दे इशारे.
आज ‘व्यूज’ और ‘वायरल’ होने की होड़ ने भोजपुरी की उस समृद्ध विरासत को ‘सस्ते मसाले’ में तब्दील कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि लोग क्या देख रहे हैं, सवाल यह है कि कलाकार अपनी संस्कृति को किस दिशा में ले जा रहे हैं. यदि समय रहते इस भाषाई पतन को नहीं रोका गया, तो भोजपुरी की पहचान केवल विवादों तक ही सीमित रह जाएगी.
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