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‘Sholay- The Final Cut’ क्यों देखें? कितना अलग है नया वर्जन? क्या है इमरजेंसी से गब्बर की ‘मौत’ का कनेक्शन; यहां जानें सब

Sholay The Final Cut: 'शोले- द फाइनल कट' नाम से री-रिलीज हुई फिल्‍म 1975 में रिलीज हुई 'शोले' से कुछ हद तक अलग है. सबसे बड़ा रोमांच तो यही है कि दर्शक ओरिजनल क्‍लाइमैक्‍स के साथ इसे देख पाएंगे.

Sholay The Final Cut: ओडिपस कॉम्प्लेक्स (Oedipus Complex) की तरह ‘शोले’ के बारे में भी कहा जाता है कि ऐसी फिल्म ना तो कभी बनी थी और ना ही बनेगी. भले ही यह बात हर किसी को हजम नहीं हो, लेकिन सिनेमा लवर इससे 100 प्रतिशत इत्तेफाक रखते हैं. सिनेमा का शौकीन नहीं भी होगा तो भी हिंदुस्तान के करीब-करीब हर शख्स ने ‘शोले’ फिल्म जरूर देखी होगी. हिंदुस्तान में ही क्यों इस फिल्म की दीवानगी दुनिया भर में है. 50 साल पहले 1975 में रिलीज होने के बाद भी ‘शोले’ का क्रेज़ कभी कम नहीं हुआ है. फिल्म की कहानी, किरदार और एक्टर्स के अभिनय का जादू ही है कि यह आज भी हर पीढ़ी के दर्शकों के बीच देखी और पसंद की जाती है.

50 साल बाद फिर ‘शोले’

इंडियन सिनेमा की आइकॉनिक फिल्मों में शुमार ‘शोले’ का जिक्र आते ही उसका हर सीन दर्शकों की आंखों के सामने तैरने लगता है. फिल्म के 50 साल पूरे होने के मौके पर 1975 में बनी इस फिल्‍म ने एकबार फिर बड़े पर्दे पर धमाकेदार वापसी की है. भले ही इस फिल्म का मुकाबला ‘धुरंधर’ से है, लेकिन लोग इस फिल्म को देखने के लिए दीवाने से नजर आ रहे हैं.  फिल्म की कहानी और बदलाव के बारे में जानने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इसकी कहानी सलीम जावेद ने लिखी थी और रमेश सिप्पी ने इसका निर्देशन किया था. सबसे बड़ी बात यह है कि यह कल्ट क्लासिक 15 अगस्त, 1975 को रिलीज हुई थी.

ओरिजनल क्‍लाइमैक्‍स देख सकेंगे फिल्म में

धर्मेंद्र, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, अमजद खान, जया बच्‍चन, हेमा मालिनी स्‍टारर और असरानी जैसे अनगिनत किरदारों से बुनी ‘शोले’ नए नाम और ओरिजनल क्‍लाइमैक्‍स के साथ रिलीज की गई है.  फिल्म ‘शोले : द फाइनल कट’ नाम से रिलीज हुई है.  वर्ष 1975 में रिलीज इस फिल्म के क्लाइमेक्स को इमरजेंसी के कारण सेंसर बोर्ड ने बदलवा दिया था. ओरिजनल क्लाइमेक्स में ठाकुर को गब्बर सिंह मारते हुए दिखाया गया था वह भी अपने कील वाले जूतों से मसलकर. वहीं सेंसर बोर्ड के दबाव में तब इसे बदला गया. दरअसल,  1975 में रिलीज हुई ‘शोले’ के इस सीन में उसी वक्त पुलिस आ जाती है और गब्बर गिरफ्तार हो जाता है. इतना ही नहीं, इस फिल्म के पहले शूट हुए क्‍लाइमैक्‍स में गब्बर की मौत का सीन और इमाम साहब के बेटे अहमद की हत्‍या का सीन काफी लंबा था. उस दौरान सेंसर बोर्ड ने इन सीन्‍स पर कैंची चला दी थी. सेंसर बोर्ड का तर्क था ठाकुर द्वारा गब्‍बर सिंह को नुकीले जूतों से मारना और अमजद की हत्या के सीन बहुत हिंसक हैं. इससे समाज में गलत संदेश जाता. लोग बदला लेने के लिए प्रेरित होते. 

19 मिनट लंबी है फिल्म ‘शोले: द फाइनल कट’

‘शोले: द फाइनल कट’ के नाम से रिलीज फिल्म में दर्शकों सारे सीन देखने को मिलेंगे, जिन्हें उस वक्त सेंसर बोर्ड ने दबाव डालकर या तर्क देकर हटवा दिया था. बताया यह भी जाता है कि ज्यादा लंबे होने की वजह से मेकर्स ने कई सीन हटा दिए थे. यह एक बड़ी वजह है, जिससे ‘शोले: द फाइनल कट’ फिल्म करीब 19 मिनट लंबी हो गई है. 1975 में रिलीज हुई फिल्म ‘शोले’ की अवधि 190 मिनट यानी लगभग 3 घंटे 10 मिनट की थी. अब ‘शोले: द फाइनल कट’ 209.05 मिनट यानी 3 घंटे 29 मिनट और 5 सेकेंड की है.

फिल्म में दिखाया गया है कैसे की गब्बर ने अहमद की हत्या

‘शोले: द फाइनल कट’ के उस सीन में भी बदलाव किया गया है, जिसमें रहीम चाचा (एके हंगल) के बेटे अहमद (सचिन पिलगांवकर) के मारने का सीन है. फाइनल कट में दिखाया गया है कि गब्बर कैसे अहमद को गर्म तलवार से जला-जलाकर मारता है. ‘शोले’ में रिलीज के वक्त सेंसर बोर्ड ने इस सीन को अत्यधिक हिंसक कहते हुए हटवा दिया था. इसके अलावा ‘शोले: द फाइनल कट’ में ठाकुर दुश्मन गब्बर को पुलिस के हवाले न करके अपने कील लगे जूतों के जरिये जान से मार देता है. 

रामलाल कैसे तैयार करता है नुकीले जूते

‘शोले: द फाइनल कट’ फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि गब्बर से बदला लेने की तैयारी की कड़ी में परिवार का नौकर रामलाल (सत्येन कप्पू) नुकीले जूते तैयार करता है. यह भी दिखाया गया है कि स्वामी भक्त रामलाल कैसे ठाकुर के स्पाइक वाले जूते तैयार करने की कवायद करता है. जय का मशहूर ‘जेम्स बॉन्ड के पोते’ वाला कमेंट भी है. कुल मिलाक बहुत पसंद की गई फिल्म से इन बदलावों ने सच में ‘एन्हांस्ड वर्जन’ शब्द का मतलब ‘बढ़ा’ दिया है.

नजर आया तकनीकी सुधार

‘शोले: द फाइनल कट’ फिल्म न सिर्फ मूल कहानी का फिल्मांकन है, बल्कि बेहतर विजुअल और ऑडियो क्वालिटी के साथ आता है, जिससे दर्शकों को एक नया अनुभव मिलता है. 50 साल पहले भी फिल्म कुछ सिनेमाघरों में 70mm रेशियो 2.2:1 में रिलीज की गई थी. बताया जाता है कि ओरिजिनल नेगेटिव फिल्‍म हेरिटेज फाउंडेशन के पास बरसों से सुरक्षित रखे गए थे. उन पर नए सिरे से करीब ढाई साल तक काम करने के बाद अब मैग्नेटिक ट्रैक से बेहतर ऑडियो Dolby 5.1 में रिलीज किया गया है. इस तरह दर्शकों को फिल्म देखने का नया तजुर्बा मिलता है. 

‘जेम्स बॉन्ड’ रेफरेंस को बदलकर ‘तात्या टोपे’ किया गया था

फिल्म के एक दृश्य में वीरू जब बसंती को रिवाल्वर चलाना सीखाता है तो यहां जय के एक डायलॉग के ‘जेम्स बॉन्ड’ रेफरेंस को बदलकर ‘तात्या टोपे’ किया गया है. यह सीन भी आपको नए अंदाज में देखने को मिलेगा.  यह सीन भी आईकॉनिक बन गया है. 

एक अफसोस… जो हमेशा रहेगा

फिल्म की मेकिंग कंपनी इस बार फिल्म को मुंबई में ग्रैंड प्रीमियर में जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेंद्र) की मौजूदगी में रिलीज करना चाहती थी. बताया जाता है कि अमिताभ बच्चन ने अपनी ओर से इसके लिए रजामंदी दे दी थी. धर्मेंद्र से भी सिप्पी फैमिली ने फिल्म की रिलीज डेट से करीब डेढ़ महीने पहले बात कर ली थी. सबकुछ तय था, लेकिन सबकुछ डायरेक्टर के हाथ में नहीं होता. बहुत कुछ नियति के हाथ में होता है. 10 नवंबर को धर्मेंद्र को तबीयत खराब होने के चलते अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. ठीक हुए तो घर आए, लेकिन 24 नवंबर, 2025 को दुनिया को अलविदा कह दिया. मेकर्स की उम्मीदों पर पानी फिर गया. हताश-उदास मेकर्स ने इसे बेहद ही सादगी के साथ रिलीज किया है. इस फिल्म के कई कलाकार अब इस दुनिया में नहीं है. संजीव कुमार, असरानी, एके हंगल, विजु खोटे, मैक मोहन ने तो पहले ही दुनिया को अलविदा कह दिया था. असरानी और धर्मेंद्र ने तो डेढ़ महीने से भी कम अंतराल में अंतिम सांस ली. 

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JP YADAV

जेपी यादव डेढ़ दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. वह प्रिंट और डिजिटल मीडिया, दोनों में समान रूप से पकड़ रखते हैं. मनोरंजन, साहित्य और राजनीति से संबंधित मुद्दों पर कलम अधिक चलती है. अमर उजाला, दैनिक जागरण, दैनिक हिंदुस्तान, लाइव टाइम्स, ज़ी न्यूज और भारत 24 जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.कई बाल कहानियां भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. सामाजिक मुद्दों पर 'रेडी स्टडी गो' नाटक हाल ही में प्रकाशित हुआ है. टीवी और थिएटर के प्रति गहरी रुचि रखते हुए जेपी यादव ने दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक 'गागर में सागर' और 'जज्बा' में सहायक लेखक के तौर पर योगदान दिया है. इसके अलावा, उन्होंने शॉर्ट फिल्म 'चिराग' में अभिनय भी किया है. वर्तमान में indianews.in में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत हैं.

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