Utpal Dutt West Bengal Elections 2026 : विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार और आज तक सत्ता में नहीं लौटी. वाम दल कई दशकों तक सत्ता में रहे.
उत्पल दत्त के नाटक सत्ता के दमन के खिलाफ ही रहे
Utpal Dutt West Bengal Elections 2026 : नेगेटिव रोल हों या फिर कैरेक्टर रोल, महान एक्टर उत्पल दत्त ने अपनी अभिनय क्षमता से दर्शकों के साथ-साथ आलोचकों को भी प्रभावित किया. विलेन हो या फिर कॉमेडी का रोल उत्पल दत्त हर कैरेक्टर में फिट बैठते थे. अमोल पालेकर अभिनीत और ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘गोल माल’ में मूंछों के शौकीन भवानी शंकर कैरेक्टर को कौन भूल सकता है? 29 मार्च, 1929 में जन्मे उत्पल दत्त बेशक लीजेंड्री कलाकार थे. एक दौर में फिल्मों से नफरत करने वाले उत्पल दत्त कर्ज की वजह से रंगमंच और फिल्मों की दुनिया में आए. बावजूद इसके वह अभिनय से इश्क कर बैठे. वह नाटककार भी बन गए. इस स्टोरी में हम बात करेंंगे उस किस्से की, जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया. आखिरकार कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी पश्चिम बंगाल में सरकार नहीं बना पाई.
अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के जरिये दर्शकों को एकबारगी डराने वाले उत्पल दत्त ने जीवन छोड़िये रियल लाइफ में कभी किसी को थप्पड़ तक नहीं मारा होगा. बावजूद इसके बड़ी आंखों और घनी मूंछें के साथ गहरी आवाज से वह लोगों के दिलों में डर का माहौल कर देते थे. उन्होंने एक इंटरव्यू में स्वीकार भी किया था कि वह फिल्मों में इसलिए काम करते हैं, जिससे थिएटर करने का खर्चा निकाल सकें. दरअसल, उत्पल दत्त को थिएटर से बेहद लगाव था.
1940 के दशक में उत्पल दत्त को नाट्य निर्देशक ज्योफ्री कैंडल ने बहुत प्रभावित किया. वह जेफ्री केंडल के थिएटर ग्रुप से जुड़े. उन्होंने अभिनय के गुर उनसे सीखे और थिएटर के माहौल को जिया. इस दौरान उन्होंने लेखकर और नाटककार विलियम शेक्सपियर के अंग्रेजी नाटकों में अभिनय किया. कोलकाता (तब कलकत्ता) के सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई करने के दौरान उत्पल दत्त का साहित्य के प्रति प्रेम जगा. उस दौरान में शरतचंद्र चटर्जी, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्र नाथ टैगोर के अलावा सामाजिक क्षेत्र में कई लोग सक्रिय थे, जिनसे उत्पल दत्त प्रभावित हुए. साहित्यिक अध्ययन और उपन्यास आदि पढ़ने के दौरान उनकी रंगमंच में रुचि जगी.
उत्पल दत्त ने कलकत्ता (अब कोलकाता ) के सेंट जेवियर कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अपने पहले थिएटर समूह एमेच्योर शेक्सपियरियंस की शुरुआत की. इसके जरिये उन्होंने और ग्रुप के साथियों ने शेक्सपियर के नाटकों का मंचन किया. वर्ष 1947 में समूह का रिचर्ड तृतीय नाटक का मंचन चल रहा था. इस दौरान यह नाटक शेक्सपियरियन थिएटर कंपनी के सदस्यों ने देखा. इसकी अगुवाई रंगमंच कलाकार ज्योफ्री केंडल कर रहे थे. ज्योफ्री केंडल के निर्देशन का अंदाज, अभिनय सिखाने का लहजा उत्पल दत्त को भी बहुत पसंद आया. ज्योफ्री केंडल को उत्पल दत्त की उत्सुकता पसंद आई. दोनों साथ आ गए. इसके बाद उत्पल दत्त ने कंपनी के साथ दो बार (1947-49 और 1953-54) भारत और पाकिस्तान का दौरा किया. इस दौरान उत्पल दत्त ने शेक्सपियर के चर्चित नाटक ‘ओथेलो’ के अपने भावपूर्ण अभिनय के लिए प्रशंसा हासिल की. उत्पल दत्त ने कई बार इसे स्वीकार भी किया कि उन्होंने ज्योफ्री केंडल से बहुत कुछ सीखा है. वो केंडल को अपना सही मायने में गुरु मानते थे.
नाट्य निर्देशक केंडल से रंगमंच के गुर सीखने वाले उत्पल दत्त ने अंग्रेजी के नाटकों में काम करने के दौरान बहुत कुछ सीखा. उनकी इच्छी अपनी मातृ भाषा में नाटकों का मंचन करने की हुई, क्योंकि वह अब तक बंगाली और अंग्रेजी साहित्य का ठीक-ठाक अध्ययन कर चुके थे. वर्ष 1947 में उत्पल दत्त ने एक रंगमंच समूह बनाया. कुछ सालों के बाद यानी वर्ष 1949 में इसे नाम दिया- ‘लिटिल थिएटर ग्रुप’.
‘लिटिल थिएटर ग्रुप’ के जरिये उत्पल दत्त ने ऐसे नाटकों का मंचन किया जो अंग्रेजी नाटककार शेक्सपियर और जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त से प्रभावित थे. इसके बाद उन्होंने बंगाली साहित्य पर कई नाटकों का मंचन किया और वाहवाही लूटी. 1949 में उन्होंने अपना नाट्य समूह ‘लिटिल थिएटर ग्रुप’ बनाया और फिर इप्टा से जुड़े. वह उन दिनों बंगाल में नुक्कड़ नाटकों में काम करते थे. उत्पल दत्त ने ‘अंगार’, ‘कल्लोल’, ‘दिन बदलेर पाला’, ‘तीवेर तलवार’, ‘बैरिकेड’ और ‘दुस्वप्नेर नगरी’ समेत कई नाटकों में काम किया. ये सभी कालजयी नाटक थे, जिनका मंचन आज भी किया जाता है. इसी दौरान उन्होंने खुद माना था कि वह फिल्मों में इसलिए काम करते थे, जिससे वो थिएटर का खर्च निकाल सकें.
थिएटर करने के दौरान उत्पल दत्त ने बतौर एक्टर और डायरेक्टर ‘टिनेर तलवार’ (टीन की तलवार), ‘मानुषेर अधिकार’ (मानव अधिकार) और ‘कल्लोल’ जैसे नाटकों के रूप में उन्होंने स्थापित व्यवस्था को चुनौती दी. इन नाटकों में शासकों के अन्याय को उजागर किया. उनके राजनीतिक संबंधों ने उन्हें ‘थर्डथिएटर’ के रूप में नुक्कड़ नाटक आंदोलन की प्रेरणा दी. इस दौरान पश्चिम बंगाल में सत्तासीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की. सेंसर ने भी चाबुक चलाया, लेकिन उत्पल दत्त कभी झुके नहीं. यहां तक कि क्रांतिकारी नाटकों के लिए वर्ष 1965 में उन्हें प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया, मगर उन्होंने धैर्य से खड़ा रहना नहीं छोड़ा. दरअसल, उत्पल दत्त मार्क्सवादी विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित थे और राजनीतिक रंगमंच की क्रांतिकारी शक्ति के प्रबल समर्थक थे. उन्होंने राजनीतिक रूप से विवादास्पद बंगाली नाटक लिखे और निर्देशित किए. इनमें विशेष रूप से ‘अंगार’ (1959) नाटक भी है. यह नाटक एक भारतीय कोयला खदान में घटी वास्तविक त्रासदी पर आधारित है. इसके चलते ही उन्हें 1965 में गिरफ्तार किया गया और कई महीनों तक हिरासत में रखा गया.
सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को डर था कि उत्पल दत्त के नाटक ‘कल्लोल’ (1963; लहरों की आवाज़) ने पश्चिम बंगाल में सरकार विरोधी प्रदर्शनों को भड़काया था. इस नाटक में पार्टी द्वारा 1946 में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध रॉयल इंडियन नेवी के नाविकों के विद्रोह को दबाने में निभाई गई भूमिका की कड़ी आलोचना की गई थी. वर्ष 1967 में उत्पल दत्त को दूसरी बार गिरफ्तार किया गया, जब उन्होंने अपने नाटक तीर (तीर) के जरिये नक्सलवादी आंदोलन में एक सशस्त्र विद्रोह के प्रति सहानुभूति दिखाई. कई शर्तों को लादने के बाद उत्पल दत्त को रिहा किया गया. वह रुके नहीं बल्कि 1970 के दशक के दौरान उनके तीन नाटक छाए रहे. बैरिकेड (1972), दुस्वप्नेर नगरी (1974; दुःस्वप्न नगरी), और एबार राजार पाला (1977; अब राजा की बारी है) के मंचन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने के उनके निर्णय की आलोचना के कारण आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित होने के बावजूद भारी भीड़ को आकर्षित किया. कहा जाता है कि उनके नाटकों में उठा गए मुद्दों ने कांग्रेस की हालत पतली कर दी. वामपंथी दलों का भी साथ मिला. इसके बाद कांग्रेस हारी और फिर वह सत्ता में कभी नहीं आई.
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