Zihaale-E-Miskin Song: 1985 में आई मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म ‘गुलामी’ का एक गाना 'ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन ब-रंजिश' आज भी खूब सुना जाता है. इस गाने को सुनने वालों बहुत से लोगों का आज भी इसका अर्थ नहीं पता होगा. दरअसल, गाने में इस्तेमाल हुई लाइन महान कवि अमीर खुसरो की एक गजल से ली गई है.
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन ब-रंजिश का अर्थ
Zihaale-E-Miskin Meaning: हिंदी सिनेमा के दशकों पुराने कई ऐसे गाने हैं, जिसे आज भी खूब सुना जाता है. ऐसा ही एक गाना है- ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन ब-रंजिश’. इस गाने का मतलब शायद ही किसी को पता हो, लेकिन आज भी काफी पॉपुलर है. यह गाना सन् 1985 में आई फिल्म ‘गुलामी’ में मिथुन चक्रवर्ती और अनीता राज पर फिल्माया गया था. इस फिल्म में धर्मेंद्र, नसीरुद्दीन शाह, रीना रॉय और स्मिता पाटिल भी हैं. ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन ब-रंजिश’ का क्या मतलब और इसे किसने लिखा है.
दरअसल, ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन ब-रंजिश’ गाने में इस्तेमाल हुई लाइन महान कवि अमीर खुसरो की एक गजल से ली गई है. उनकी रचना से प्रेरणा लेकर मशहूर गीतकार गुलजार ने अपने हिसाब से लिखा है.
गुलजार ने लिखा है- ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन ब-रंजिश, बेहाल-ए-हिजरां बेचारा दिल है…सुनाई देती है जिसकी धड़कन, तुम्हारा दिल या हमारा दिल है…’ गुलजार के लिखे इस गीत का मतलब हुआ- ‘मेरे दिल का थोड़ा ध्यान रखो, इससे रंजिश (नाराजगी) न रखो. इस बेचारे ने अभी बिछड़ने का दुख सहा है.’
वहीं अमीर खुसरो की बात करें तो उन्होंने इस लाइन को कुछ इस तरह लिखा है- ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनां बनाए बतियां, कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जां न लेहू काहे लगाए छतियां’. फारसी और खड़ी हिंदी भाषा में लिखी इस लाइन अर्थ है- ‘बातें बनाकर और नजरें चुराकर मेरी लाचारी की अवहेलना न कर. जुदाई की अगन से जान जा रही है. मुझे अपनी छाती से क्यों नहीं लगा लेते.’
ऐसे में अब आप भी समझ गए होंगे कि गुलजार ने किस तरह अमीर खुसरो की गजल से प्रेरणा लेते हुए ‘ज़े-हाल-ए मिस्कीं मकुन ब-रंजिश’ को लिखा है. गुलामी फिल्म में इस गाने को लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार ने गाया है. वहीं इस गीत का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया है. इस गाने को ‘Goldmines Gaane Sune Ansune’ नाम के यू-ट्यूब चैनल पर ही 390 मिलियन से ज्यादा बार सुना जा चुका है.
अमीर खुसरो 13वीं शताब्दी के सूफी कवि थे, जिन्हें तूती-ए-हिंद, यानी ‘भारत का तोता’ की भी उपाधि दी गई थी. खुसरो का वास्तविक नाम अबुल हसन यामीनुद्दीन खुसरो था. उनका जन्म 27 दिसंबर 1253 में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली में हुआ था. उनकी एक पहचान दिल्ली के प्रतिष्ठित सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य के रूप में भी है. अमीर खुसरो का निधन 1325 में हुआ था.
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