US स्पेस एजेंसी NASA के एक सुपरकंप्यूटर मॉडल के मुताबिक, भविष्य में सूरज की रोशनी और गर्मी इतनी बढ़ जाएगी कि धरती का एटमॉस्फियर बदलने लगेगा. टेम्परेचर बढ़ने से समुद्र का पानी भाप बनकर उड़ जाएगा. ऑक्सीजन बनाने वाले माइक्रोऑर्गेनिज्म खत्म होने लगेंगे. इससे हवा में ऑक्सीजन का लेवल तेजी से कम होने लगेगा.
नासा के सुपरकंप्यूटर ने बताया कि धरती पर प्रलय कब होगा (pc- x)
NASA: दुनिया कब खत्म होगी? यह सवाल अक्सर कई लोगों के मन में आता है. कई भविष्यवाणियों में दावा किया गया है कि पृथ्वी खत्म हो जाएगी. यहां तक कि बुल्गारिया के संत वंगा और मशहूर फ्रांसीसी भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस ने भी दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणी की है. हालांकि एक साइंटिफिक स्टडी ने पृथ्वी के खत्म होने की सही तारीख का पता लगाया है. साइंटिस्ट्स ने यह भविष्यवाणी एक सुपरकंप्यूटर का इस्तेमाल करके की है.
यह स्टडी बताती है कि पृथ्वी का अंत कैसे होगा. सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह युद्ध या किसी एस्टेरॉयड से नहीं, बल्कि सूरज से खत्म होगी. साइंटिस्ट्स का कहना है कि जैसे-जैसे सूरज का तापमान बढ़ेगा, पृथ्वी का बैलेंस बिगड़ेगा. हालांकि अभी यह कोई खतरा नहीं है. अनुमान है कि ऐसा लाखों साल बाद होगा, लेकिन साइंटिस्ट्स अभी से परेशान हैं.
यह स्टडी साइंटिस्ट्स काज़ुमी ओज़ाकी और क्रिस्टोफर रेनहार्ड ने की है. उनकी रिसर्च के मुताबिक पृथ्वी पर जीवन हमेशा नहीं रहेगा. उनका कहना है कि जीवन के लिए सबसे ज़रूरी तत्व ऑक्सीजन भविष्य में धीरे-धीरे खत्म हो सकता है. पहले साइंटिस्ट मानते थे कि धरती पर जीवन 2 अरब साल तक रह सकता है, लेकिन नई रिसर्च ने इस समय को घटाकर करीब 1 अरब साल कर दिया है. ऑक्सीजन, जिसे धरती की जान माना जाता है, हमेशा नहीं रहेगी.
US स्पेस एजेंसी NASA के एक सुपरकंप्यूटर मॉडल के मुताबिक, भविष्य में सूरज की रोशनी और गर्मी इतनी बढ़ जाएगी कि धरती का एटमॉस्फियर बदलने लगेगा. टेम्परेचर बढ़ने से समुद्र का पानी भाप बनकर उड़ जाएगा. ऑक्सीजन बनाने वाले माइक्रोऑर्गेनिज्म खत्म होने लगेंगे. इससे हवा में ऑक्सीजन का लेवल तेजी से कम होने लगेगा. साइंटिस्ट मानते हैं कि इससे एक ऐसा समय आएगा जब सांस लेना नामुमकिन हो जाएगा और ज़्यादातर तरह के जीवन खत्म हो जाएंगे.
इस रिसर्च से पता चलता है कि करीब 1 अरब साल बाद, धरती का ऑक्सीजन लेवल एक परसेंट से भी कम हो जाएगा. यह ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट से पहले धरती पर मौजूद हालात जैसा होगा. उस समय ऑक्सीजन का लेवल बहुत कम था. ठीक उसी तरह, उस समय भी इस एटमॉस्फियर में कुछ ही बैक्टीरिया ज़िंदा रह पाएंगे. इंसान, जानवर और पौधे इस बदलाव को झेल नहीं पाएंगे. इसे पृथ्वी के जीवन चक्र का एक स्वाभाविक अंत माना जा रहा है.
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