Who is Owner Of Parle: पारले नाम तो सभी ने सुना होगा. इस ब्रांड का बिस्किट हर घर में खाया जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका मालिक कौन है, कब बनी थी ये कंपनी, आज के समय में इसे कौन संभाल रहा. आइए जानते हैं-
who is parle company owner
Who is Owner Of Parle: भारत के लगभग हर घर में मिलने वाला एक बिस्किट ऐसा है जो बचपन की यादों से लेकर एग्जाम की रातों, बिजली जाने के समय और चाय के हर छोटे-बड़े ब्रेक तक हमारे साथ रहा है. वो बिस्किट है पारले-जी. लेकिन इसके पीछे की कंपनी और इसके मालिकाना हक की कहानी क्या आप जानते हैं.
आपको बता दें कि पारले एक फैमिली कंपनी है, जो चौहान परिवार की है. लेकिन असल में आज ‘पारले’ एक ही कंपनी नहीं है. ये परिवार की तीन अलग-अलग कंपनियों में बंट चुकी है, जो आज भी पारले नाम का इस्तेमाल करती हैं. इसी बंटवारे और उसके पीछे की कहानी भारतीय बिजनेस इतिहास की सबसे रोचक कहानियों में से एक मानी जाती है.
पारले की नींव 1920 के दशक में पड़ी, जब स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में था. इसी दौर में मोहनलाल दयाल चौहान ने मुंबई के विले पार्ले इलाके में एक छोटी फैक्ट्री शुरू की. उन्होंने ये काम जर्मनी से सीखी हुई कन्फेक्शनरी तकनीक के आधार पर शुरू किया.
शुरुआत बहुत सिंपल थी न बड़ा पैसा था, न बड़े संपर्क. मोहनलाल चौहान मूल रूप से गुजरात के वलसाड जिले के परडी गांव से थे. मुंबई आकर उन्होंने पहले टेलरिंग की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने खाने-पीने के व्यवसाय की ओर रुख किया और बेकरी शुरू की, जिसमें ब्रेड, बन, रस्क और नानखटाई बनाई जाती थी.
कंपनी की शुरुआत सिर्फ 12 कर्मचारियों के साथ हुई थी. इसका नाम उसी इलाके ‘विले पार्ले’ के नाम पर रखा गया. एक दिलचस्प बात ये भी है कि शुरुआत में फैक्ट्री का कोई औपचारिक नाम तय नहीं किया गया था और धीरे-धीरे यही ‘पारले’ पहचान बन गया.
पारले ने शुरुआत में कन्फेक्शनरी यानी मिठाइयों और कैंडी पर ध्यान दिया. उनका पहला प्रोडक्ट ऑरेंज कैंडी था. इसके बाद लगभग एक दशक तक इसी क्षेत्र में काम चलता रहा.
साल 1939 में कंपनी ने बिस्किट की दुनिया में कदम रखा और बनाया पारले ग्लूको बिस्किट, जिसने आगे चलकर भारतीय घरों में अपनी मजबूत जगह बना ली और वही आगे चलकर ‘पारले-जी’ बना.
1970 के दशक में चौहान परिवार के भीतर मतभेद और अलग-अलग व्यापारिक सोच के कारण कंपनी का विभाजन हो गया. इसके बाद पारले तीन अलग-अलग कंपनियों में बंट गई, लेकिन नाम सभी ने ‘पारले’ ही रखा. इस बंटवारे के बाद- एक हिस्सा बिस्किट और कन्फेक्शनरी में गया, दूसरा पेय पदार्थों में और तीसरा पैकेज्ड वॉटर में.
ये वही कंपनी है जिसे लोग आमतौर पर ‘पारले’ समझते हैं. इसी के तहत पारले-जी जैसे फेमस बिस्किट बनाए जाते हैं. आज इस कंपनी का संचालन चौहान परिवार की अगली पीढ़ी विजय चौहान, राज चौहान और शरद चौहान करते हैं. पारले-जी आज भी भारत ही नहीं, दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्किट ब्रांड्स में से एक माना जाता है.
दूसरी कंपनी पारले एग्रो है, जो पेय पदार्थ बनाती है. इसके मेन ब्रांड हैं फ्रूटी और ऐप्पी फिज. इसी कंपनी ने भारत में पहली बार मैंगो ड्रिंक को टेट्रा पैक में लॉन्च किया था. फ्रूटी ने जल्दी ही देश में सबसे लोकप्रिय आम पेय का दर्जा हासिल कर लिया.
तीसरा हिस्सा पारले बिसलेरी के नाम से जाना जाता है, जो बाद में बिसलेरी इंटरनेशनल बना. इस ब्रांड ने भारत में पैकेज्ड पीने के पानी की क्रांति ला दी. इस व्यवसाय को चौहान परिवार के ही एक अन्य हिस्से ने आगे बढ़ाया और आज ये भारत का सबसे बड़ा वाटर ब्रांड माना जाता है.
Sawan Teej 2026: सावन में हरियाली तीज महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण उत्सव है.…
Sushan Singh Rajput: हाल ही में श्वेता सिंह कीर्ति ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत…
कोलंबो स्थित एक क्रिकेट क्लब में खिलाड़ियों के साथ कहासुनी के बाद श्रीलंका के क्रिकेट…
Zen-alpha Movement: झारखंड के गढ़वा जिले के कांडी प्रखंड में सरकारी शिक्षक मलय सिंह के…
देवरिया में पीएम श्री जीआईसी परिसर से छात्राओं द्वारा तिरंगा यात्रा निकाली जा रही थी.…
नांदेड़ गुरुद्वारे में पंजाब के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुखबीर बादल पर कृपाण से हमला हो गया.…