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Wilson Disease: विल्सन डिजीज एक दुर्लभ लेकिन गंभीर आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर में कॉपर यानी तांबा जरूरत से ज्यादा जमा होने लगता है. सामान्य स्थिति में लिवर अतिरिक्त कॉपर को बाहर निकाल देता है, लेकिन इस बीमारी में यह प्रक्रिया सही से काम नहीं करती और धीरे-धीरे शरीर के कुछ पार्टस प्रभावित होने लगते हैं. आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से.
जानिए विल्सन डिजीज के लक्षण और बचाव के बारे में
Wilson Disease: विल्सन डिजीज एक आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर में कॉपर (तांबा) जरूरत से ज्यादा जमा होने लगता है. यह मुख्य रूप से लिवर, दिमाग और आंखों को प्रभावित करती है और समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं, जैसे थकान, कमजोरी, पीलिया, हाथ कांपना और व्यवहार में बदलाव.
आंखों में दिखने वाली रिंग इसका खास संकेत हो सकती है. डॉक्टर ब्लड, यूरिन और आंखों की जांच से इसकी पहचान करते हैं. यह बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं होती, लेकिन दवाओं और सही देखभाल से इसे कंट्रोल किया जा सकता है.
कैसे होती है यह बीमारी?
इस बीमारी की जड़ एक जीन में खराबी होती है, जिसे ATP7B कहा जाता है. इसी के कारण शरीर अतिरिक्त कॉपर को बाहर नहीं निकाल पाता. यह समस्या माता-पिता से बच्चों में जाती है, लेकिन अक्सर परिवार को इसका पता भी नहीं होता क्योंकि कई लोग केवल कैरियर होते हैं.
शरीर पर क्या असर पड़ता है?
जब कॉपर शरीर में जमा होने लगता है, तो सबसे ज्यादा असर लिवर और दिमाग पर पड़ता है. शुरुआत में लक्षण हल्के होते हैं, लेकिन समय के साथ ये गंभीर रूप ले सकते हैं और कई अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
किन लक्षणों से करें पहचान?
इस बीमारी के संकेत धीरे-धीरे सामने आते हैं. व्यक्ति को लंबे समय तक थकान, कमजोरी, भूख कम लगना या पेट दर्द की शिकायत रह सकती है. कुछ मामलों में आंखों और त्वचा का पीला पड़ना भी दिखता है. दिमाग पर असर होने पर हाथ कांपना, बोलने में दिक्कत और व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षण नजर आते हैं. कई लोगों की आंखों में एक खास तरह की रिंग भी बन जाती है, जो इस बीमारी का संकेत मानी जाती है.
डॉक्टर कैसे करते हैं जांच?
Wilson Disease की पुष्टि के लिए डॉक्टर ब्लड और यूरिन टेस्ट कराते हैं. इसके अलावा आंखों की खास जांच और जरूरत पड़ने पर जेनेटिक टेस्ट भी किया जाता है, ताकि बीमारी की सही पहचान हो सके.
क्या है इलाज और बचाव?
यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती, लेकिन समय पर इलाज शुरू हो जाए तो इसे कंट्रोल किया जा सकता है. दवाओं की मदद से शरीर में कॉपर की मात्रा कम की जाती है और मरीज को नियमित जांच करानी होती है. सही खानपान और डॉक्टर की सलाह का पालन करना भी बहुत जरूरी होता है.
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