देश की पहली मुस्लिम महिला CM सैयदा अनवरा तैमूर की अनसुनी कहानी, जब उन्होंने आंदोलन के बीच असम की कमान संभाली थी. क्या था वो सियासी दांव और कैसा रहा उनका सफर? यहां पढ़ें...
देश की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री सैयदा अनवरा तैमूर
Syeda Anwara Taimur: आपने सामान्य ज्ञान की किताब में जरूर पढ़ा होगा कि देश की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री कौन थीं. वह राज्य कौन था. उन्होंने क्या-क्या काम किये. उन्होंने अंतिम सांस कहां ली. आज हम इन सवालों के जवाब नहीं देने आए हैं. हम इस व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोने आए हैं. असल में हम ऐसे लोगों के बारे में बहुत कम जानते हैं, जिन्हें जानना चाहिए था. हम तो उनपर बात ही नहीं करते. उनके अच्छे-बुरे कामों पर बहस भी नही करते, हमारे लिए भी यह मुश्किल है कि अगर हम भी बात नहीं करेंगे, तो फिर भला कौन करेगा.
हम बात कर रहे हैं सैयदा अनवरा तैमूर की. साल 2020 में जब पूरी दुनिया कोरोनावायरस महामारी की चपेट में थी, तब सितंबर के महीने में अनवरा तैमूर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. 84 वर्षों का जीवन जीने वाली अनवरा तैमूर ने अपने अंतिम क्षणों तक शिक्षा से लेकर राजनीति तक विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया. आज भी उन्हें असम की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है. इसके अलावा अनवरा तैमूर के नाम देश की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री होने का खिताब भी दर्ज है.
अनवरा तैमूर को मुख्यमंत्री का पद संभालने का अवसर ऐसे समय में मिला, जब असम ‘असम आंदोलन’ की आग में झुलस रहा था. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और ऑल असम गण संग्राम परिषद (AAGSP) के नेतृत्व में स्थानीय आबादी और अवैध प्रवासियों के बीच एक भीषण संघर्ष चल रहा था. पूरे असम में पूरी तरह से अशांति का माहौल व्याप्त था. केंद्र में, जनता पार्टी का प्रभाव कम हो चुका था और इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाल लिया था. इसी बीच, असम में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था. असम की जनता के बीच कांग्रेस पार्टी के प्रति असंतोष पनप रहा था. इस बढ़ते गुस्से को शांत करने के मकसद से कांग्रेस पार्टी ने दिसंबर 1980 में अनवरा तैमूर को असम के मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी सौंपी.
दरअसल, इस फ़ैसले के पीछे मुख्य वजह वह जबरदस्त इज़्जत थी जो अनवरा तैमूर को समाज में हासिल थी. वह एक मुस्लिम महिला थीं जो साथ ही राज्य की मूल निवासी भी थीं. आंदोलन की अगुवाई करने वाले लोग खुद मूल निवासी थे और यह आंदोलन मुख्य रूप से बांग्लादेश से आने वाले प्रवासियों के खिलाफ था. इस समूह में बड़ी संख्या में मुस्लिम भी शामिल थे. कहा जाता है कि जहां अनवरा तैमूर को सत्ता में लाने का फ़ैसला स्थानीय लोगों के गुस्से को शांत करने की एक कोशिश थी, वहीं इस कदम को प्रवासी मुस्लिम समुदाय का दिल जीतने की एक रणनीतिक कोशिश के तौर पर भी देखा गया. इन पेचीदा समीकरणों और मौजूदा हालात की पृष्ठभूमि में अनवरा तैमूर ने असम के मुख्यमंत्री का पद संभाला.
हालाँकि अनवरा तैमूर इस पद पर पूरे एक साल भी नहीं रह पाईं. जून 1981 में असम में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. इसके बाद जब असम में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बनी तो अनवरा तैमूर को एक अहम विभाग लोक निर्माण विभाग (PWD)की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. इसी बीच इंदिरा गांधी की हत्या के बाद केंद्र में राजीव गांधी सत्ता में आए और 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर के साथ यह आंदोलन आखिरकार खत्म हो गया.
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