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ग्लेशियर पिघले, झीलों का खतरा बढ़ा और फिर आई तबाही… नेपाल में बाढ़ की 5 महीने पहले मिल गई थी चेतावनी, आख़िर कहाँ हुई गलती?

Himalayan disaster: नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ से महीनों पहले ICIMOD ने हिंदूकुश हिमालय में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को लेकर चेतावनी दी थी. रिपोर्ट के अनुसार 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में करीब 12 प्रतिशत और बर्फ भंडार में 9 प्रतिशत की कमी आई है. विशेषज्ञों को आशंका है कि बर्फ और चट्टानों के मलबे के खिसकने से भी हालिया बाढ़ की भयावहता बढ़ी हो सकती है.

Himalayan disaster: नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु संकट और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है. इस आपदा से कई महीने पहले ही काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने चेतावनी दी थी कि हिंदूकुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से अचानक आने वाली बाढ़ और ग्लेशियरों से जुड़ी अन्य आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है. मार्च 2026 में जारी ICIMOD की दो रिपोर्टों में बताया गया था कि 1975 के बाद से हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों की बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी आई है. वहीं, 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र के ग्लेशियरों ने अपने कुल क्षेत्रफल का करीब 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ भंडार का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा खो दिया.

2000 के बाद दोगुनी हुई बर्फ पिघलने की रफ्तार

ICIMOD की रिपोर्टों के मुताबिक, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति में पिछले कुछ दशकों में लगातार तेजी आई है. खास तौर पर वर्ष 2000 के बाद बर्फ के नुकसान की दर लगभग दोगुनी हो गई. इसका सबसे ज्यादा असर छोटे और अपेक्षाकृत कमजोर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है. इनके तेजी से सिकुड़ने के कारण ग्लेशियर झीलों के अचानक फटने यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है. इसके अलावा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर से जुड़े अचानक भूस्खलन और दूसरी आपदाएं भी गंभीर खतरा बनती जा रही हैं.

क्या बर्फ और चट्टानों के मलबे से आई थी अचानक बाढ़?

हाल की नेपाल-तिब्बत आपदा को लेकर ICIMOD के वैज्ञानिक एक और संभावित कारण की जांच कर रहे हैं. शोधकर्ताओं को आशंका है कि किसी ऊंचाई वाले इलाके से बर्फ और चट्टानों का बड़ा मलबा गिरने की घटना ने बाढ़ को अचानक और ज्यादा विनाशकारी बनाने में भूमिका निभाई हो सकती है. ICIMOD के शोधकर्ताओं के अनुसार, बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानों का मलबा लेंदे खोला में गिरा होगा. यह धारा भोटे कोशी नदी की सहायक नदी है. मलबे के नदी में गिरने से पानी, तलछट और बड़े-बड़े पत्थरों का अचानक तेज बहाव पैदा हो सकता है, जिसने नीचे की ओर भारी तबाही मचाई.

जलवायु परिवर्तन से कमजोर हो रहे पहाड़ी ढलान

ICIMOD के वरिष्ठ क्रायोस्फीयर विशेषज्ञ और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इंदौर के एसोसिएट प्रोफेसर मोहम्मद फारूक आजम ने बताया कि जलवायु परिवर्तन ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों को लगातार अधिक संवेदनशील बना रहा है. उनके अनुसार, जैसे-जैसे बर्फ की परत कम हो रही है और ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, वैसे-वैसे पहाड़ों की ज्यादा चट्टान और जमीन खुली सतह के रूप में सामने आ रही है. ये सतहें अधिक गर्मी सोखती हैं. इससे पहाड़ी ढलानों की स्थिरता कमजोर हो सकती है और चट्टानों तथा बर्फ के खिसकने का खतरा बढ़ सकता है.

एक देश से दूसरे देश तक पहुंच जाती है आपदा

नेपाल और तिब्बत में हुई इस आपदा ने यह भी दिखाया है कि हिमालय में शुरू होने वाली प्राकृतिक आपदाएं किसी देश की राजनीतिक सीमा तक सीमित नहीं रहतीं. आजम के मुताबिक, पहाड़ों के ऊपरी हिस्से में शुरू होने वाली बाढ़ या ग्लेशियर से जुड़ी कोई घटना तेजी से नीचे की ओर बढ़ सकती है और रास्ते में आने वाले दूसरे देशों के इलाकों को भी प्रभावित कर सकती है. इस मामले में आपदा की शुरुआत नेपाल हिमालय में हुई और इसका प्रभाव तेजी से तिब्बत तक पहुंचा. वहां बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने के बाद बाढ़ का पानी फिर नेपाल की ओर बढ़ गया.

दुनिया के ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे बड़ा बर्फ भंडार

हिंदूकुश हिमालय दुनिया के ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर बर्फ का सबसे बड़ा भंडार रखने वाले क्षेत्रों में शामिल है. ICIMOD के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं, जो 55,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैले हुए हैं. ये ग्लेशियर एशिया की 10 प्रमुख नदी प्रणालियों को पानी उपलब्ध कराते हैं. इसलिए इनका महत्व केवल हिमालयी देशों तक सीमित नहीं है. करोड़ों-अरबों लोगों की खाद्य सुरक्षा, पेयजल, ऊर्जा और आजीविका इन नदी प्रणालियों पर निर्भर करती है.

4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई वाले ग्लेशियर सबसे ज्यादा जोखिम में

मार्च 2026 में जारी ICIMOD की रिपोर्टों ने ऊंचाई के साथ बढ़ते तापमान को लेकर भी गंभीर चेतावनी दी थी. रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय में 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई के बीच मौजूद ग्लेशियर क्षेत्र का कम से कम 78 प्रतिशत हिस्सा ऊंचाई-निर्भर तापमान वृद्धि के लिहाज से अत्यधिक जोखिम में है. इन रिपोर्टों और हाल की आपदा ने एक बार फिर संकेत दिया है कि हिमालय में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल पर्यावरणीय बदलाव नहीं है, बल्कि इससे आने वाले समय में अचानक बाढ़, भूस्खलन और दूसरी विनाशकारी घटनाओं का खतरा भी बढ़ सकता है.

sharma ranjana

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