भारत में मैरिटल रेप को बलात्कार की श्रेणी में रखा ही नहीं जाता. चूंकि शादी के अंदर शारीरिक संबंध बनाना जायज माना जाता है, तो उसके बाद पत्नी की मर्जी कोई भूमिका रह ही नहीं जाती. इस आर्टिकल में भारत में marital rape की स्थिति और उससे जुड़े कानूनों के बारे में बात की गई है.
भारत में मैरिटल रेप की स्थिति
इन दिनों जियो हॉटस्टार पर एक सीरीज आई है, जिसका नाम है ‘चिरैया.’ यह सीरीज महिलाओं पर हो रहे उस शोषण को दिखाती है, जिस पर बात करने से आज भी लोग कतराते हैं. यह वेब सीरीज़ विवाह जैसी सामाजिक संस्था के अंदर महिलाओं के साथ सदियों से हो रही शारीरिक प्रताड़ना को दिखाती है.
दरअसल, भारत में मैरिटल रेप को बलात्कार की श्रेणी में रखा ही नहीं जाता. चूंकि शादी के अंदर शारीरिक संबंध बनाना जायज माना जाता है, तो उसके बाद पत्नी की मर्जी कोई भूमिका रह ही नहीं जाती. आम भारतीय परिवारों में आज भी यही माना जाता है कि पति को ‘सुख’ देना पत्नी का कर्तव्य है, जिसका उसकी इच्छा-अनिच्छा से कोई लेना देना नहीं.
वैवाहिक बलात्कार का सीधा-सा अर्थ है पति या पत्नी की सहमति के बिना उनके साथ यौन संबंध बनाना, जिसे आम भाषा में unconsentual शारीरिक संबंध कहते हैं. भारत में, यदि पत्नी की आयु 18 वर्ष से अधिक है, तो इसे कानूनी रूप से “बलात्कार” नहीं माना जाता है. भारत में वैवाहिक बलात्कार को भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद 2 (और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के समकक्ष प्रावधानों) के तहत आपराधिक दंड से छूट प्राप्त है.
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के तीसरे (2005-06) और चौथे (2015-16) दौर के अनुमानों से पता चला है कि देश के विभिन्न राज्यों में महिलाओं के विरुद्ध अंतरंग साथी हिंसा (आईपीवी) की व्यापकता 3% से 43% के बीच है. 2019-20 में आयोजित सर्वेक्षण के 5वें दौर में 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों के 707 जिलों के लगभग 637,000 नमूना परिवारों को शामिल किया गया था. इससे पता चलता है कि भारत में 18-49 आयु वर्ग की प्रत्येक 3 में से 1 महिला पति द्वारा हिंसा का शिकार होती है, जिनमें से कम से कम 5%-6% महिलाएं यौन हिंसा की रिपोर्ट करती हैं.
भारतीय कानून व्यवस्था के अंतर्गत 1860 में निर्मित आईपीसी में एक अपवाद शामिल है जो वैवाहिक बलात्कार को छूट देता है, और यौन संबंधों को एक अनिवार्य वैवाहिक अधिकार के रूप में देखता है. इसके अपराधीकरण के विरोध में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इससे विवाह संस्था अस्थिर हो सकती है या इसका दुरुपयोग हो सकता है. सरकार का तर्क है कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव और दुरुपयोग की संभावना (जैसे, झूठी शिकायतें) के लिए तत्काल अपराधीकरण के बजाय अधिक सतर्क दृष्टिकोण की आवश्यकता है. हालांकि यह मामला वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है, जो इस अपवाद की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है.
भारतीय न्यायपालिका मैरिटल रेप के अस्तित्च को ही जब मानने से इंकार करती है तो इसके लिए दंड कैसे ही मिल सकता है. भारत में कानून के अनुसार यदि पत्नी 18 वर्ष से अधिक आयु की है, तो धारा 375 आईपीसी के अपवाद 2 के कारण ऐसा नहीं हो सकता. लेकिन अधिक क्रूर व्यवहार होने पर अन्य कानूनों के तहत पति पर निम्नलिखित कानूनों के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. धारा 498ए (क्रूरता) जिसमें जबरन यौन कृत्य, विशेषकर यदि हिंसक हों, तो मानसिक या शारीरिक क्रूरता के अंतर्गत आते हैं, जिन पर मुकदमा चलाया जा सकता है. इसकी अलावा घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 विवाह के भीतर यौन शोषण के लिए नागरिक उपचार, सुरक्षा आदेश और मुआवजे का प्रावधान करता है. बता दें कि 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार माना जाता है.
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