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शिक्षा में ‘डॉक्टर’ और राजनीति में ‘दीदी’, क्या वकील नहीं होकर भी सुप्रीम कोर्ट को अपनी दलीलों से झुका पाएंगी सीएम ममता बनर्जी?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (West Bengal CM Mamata Banerjee) की शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualification) और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में उनके व्यक्तिगत रूप से बहस करने के कानूनी पहलुओं पर आधारित जानकारी दी गई है.

Mamata Banerjee on SIR: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आए दिन किसी न किसी मुद्दे को लेकर राजनीतिक गलियारों में सुर्खियां बटोरती रहती हैं.  लेकिन, अपनी जीवन के लाखों संघर्षों के बावजूद भी उन्होंने कभी भी अपनी शिक्षा को पीछे नहीं छोड़ा है. तो वहीं, दूसरी तरफ सीएम ममता बनर्जी आज एक बार फिर अपने जुझारू तेवर के साथ चर्चा में देखने को मिल रही हैं. मामला सुप्रीम कोर्ट में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) से जुड़ा है. इसके साथ ही राजनीति के मैदान में वे अपनी शर्तों पर खेलती हैं, वहीं आज कानूनी गलियारे में उनकी शिक्षा और कानूनी समझ की परीक्षा भी आपको देखने को मिलेगी. 

आखिर कितनी पढ़ी-लिखी हैं सीएम ममता बनर्जी ?

साल 19070 में कोलकाता के देशबंधु शिशु शिक्षालय से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद उन्होंने जोगमाया देवी कॉलेज से इतिहास विषय में ग्रेजुएशन पूरा किया. इसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से इस्लामी इतिहास में एमए की डिग्री हासिल की. वह यहीं नहीं रूकी, उन्होंने श्री शिक्षायतन कॉलेज से शिक्षा (Education) विषय में (B.Ed) की पढ़ाई को पूरा किया. और  फिर साल 1982 में कोलकाता के सबसे प्रसिद्ध जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की. 
इसके अलावा उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय से डी.लिट. और KIIT, भुवनेश्वर से मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी मिल चुकी हैं

सुप्रीम कोर्ट और SIR केस से सीएम खुद कर सकती हैं बहस?

सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- SIR) मामले पर सुनवाई कर रही है. जहां, मुख्यमंत्री  ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया को “अपारदर्शी” बताते हुए एक बहुत बड़ी चुनौती देने की कोशिश की है. 

वकील के रूप में क्यों नहीं पेश नहीं हो सकती हैं मुख्यमंत्री?

भले ही सीएम ममता बनर्जी के पास LLB की डिग्री है, लेकिन तकनीकी रूप से देखा जाए तो, वे अदालत में “वकील” के रूप में पेश नहीं हो सकतीं हैं. दरअसल,  इसके पीछे मुख्य वजह Advocates Act, 1961 है. जिसमें अदालत में वकालत करने के लिए स्टेट बार काउंसिल में पंजीकरण और Bar Council of India (BCI) का लाइसेंस  (CoP) होना सबसे ज्यादा जरूरी होता है, जो सीएम ममता बनर्जी के पास नहीं है. 

इसके अलावा याचिकाकर्ता के रूप में अधिकार (Petitioner-in-Person), यानी कानून किसी भी व्यक्ति को अपना पक्ष ‘स्वयं’ (In-Person) रखने की अनुमति देता है. मुखयमंत्री ममता बनर्जी ने इसके लिए कोर्ट से विशेष अनुमति (Interlocutory Application) की सख्त मांग की है. 

और सबसे आखिरी में अगर मुख्य न्यायाधीश (CJI) की पीठ अनुमति देती है, तो वे एक याचिकाकर्ता के रूप में अपनी दलीलें दे सकती हैं, लेकिन एक पेशेवर एडवोकेट के रूप में यह मौका नहीं दिया जाता है.

Darshna Deep

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