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Home > देश > यूपी पुलिस की जांच पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, निर्दोष ने जेल में बिताए 6 साल; सरकार देगी 6 लाख रुपये

यूपी पुलिस की जांच पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, निर्दोष ने जेल में बिताए 6 साल; सरकार देगी 6 लाख रुपये

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यूपी पुलिस को फटकार लगाई है. वजह है कि एक निर्दोष को 6 साल जेल में बिताने पड़े. अब सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष को छोड़ने और सरकार को उसे 6 लाख रुपये देने की बात कही है.

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Published: October 26, 2026 22:09:46 IST
Last Updated: October 26, 2026 22:09:46 IST

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Supreme Court: हत्या जैसे गंभीर मामले में पुलिस की एक बड़ी चूक किसी निर्दोष की जिंदगी के कई साल छीन सकती है. ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश से सामने आया है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की जांच पर कड़ी नाराजगी जताई है. अदालत के मुताबिक, जांच में इतनी गंभीर खामियां थीं कि दीपक नाम के एक व्यक्ति को करीब छह साल जेल में बिताने पड़े. बाद में ट्रायल कोर्ट ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को दीपक को छह लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है. अदालत ने साफ कहा कि पैसों से उसके जीवन के खोए हुए साल वापस नहीं लाए जा सकते.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला आगरा में दर्ज अपहरण और हत्या के केस से जुड़ा है. अक्टूबर 2019 में एक युवक लापता हो गया था. इसके बाद पुलिस ने दीपक और उसके एक साथी को गिरफ्तार किया. दोनों पर अपहरण, हत्या और सबूत मिटाने के आरोप लगाए गए. पुलिस ने दावा किया कि आरोपियों ने युवक को अगवा किया, फिरौती मांगी और बाद में उसकी हत्या कर शव जला दिया. इसी मामले में दीपक नवंबर 2019 से जेल में बंद था.

जांच में कहां हुई बड़ी चूक?

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की जांच से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की. अदालत ने पाया कि शुरुआती एफआईआर में दीपक का नाम नहीं था. शुरुआती गवाहों के बयानों में भी उसका जिक्र नहीं मिला. इतना ही नहीं, 50 लाख रुपये की फिरौती मांगने की बात का स्पष्ट आधार पुलिस रिकॉर्ड में नहीं था. अदालत ने जांच को गंभीर खामियों से भरा बताया.

न डीएनए जांच, न पुख्ता सबूत

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जली हुई हड्डियों को पीड़ित का अवशेष बताया गया लेकिन उनकी डीएनए जांच नहीं कराई गई. मौत का समय और कारण भी वैज्ञानिक तरीके से साबित नहीं किया गया. कथित तौर पर 55 लीटर पेट्रोल खरीदने के दावे की भी ठीक से जांच नहीं हुई. वहीं सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को पेश करने में भी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया.

डीजीपी और गृह सचिव को भेजा जाएगा फैसला

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि पुलिस का काम केवल किसी को दोषी साबित करना नहीं बल्कि निष्पक्ष जांच करके न्याय सुनिश्चित करना है. अदालत ने फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के डीजीपी और गृह सचिव को भेजने का निर्देश दिया, ताकि ऐसी गलतियां दोबारा न हों. साथ ही सरकार को दीपक को छह लाख रुपये देने का आदेश दिया गया.

ये भी पढ़ें: शाहनवाज हुसैन की बहू कौन हैं? जिनकी खूबसूरती देख दंग रह गए लोग; शादी में जुटे बड़े-बड़े दिग्गज

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Last Updated: October 26, 2026 22:09:46 IST

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Supreme Court: हत्या जैसे गंभीर मामले में पुलिस की एक बड़ी चूक किसी निर्दोष की जिंदगी के कई साल छीन सकती है. ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश से सामने आया है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की जांच पर कड़ी नाराजगी जताई है. अदालत के मुताबिक, जांच में इतनी गंभीर खामियां थीं कि दीपक नाम के एक व्यक्ति को करीब छह साल जेल में बिताने पड़े. बाद में ट्रायल कोर्ट ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को दीपक को छह लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है. अदालत ने साफ कहा कि पैसों से उसके जीवन के खोए हुए साल वापस नहीं लाए जा सकते.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला आगरा में दर्ज अपहरण और हत्या के केस से जुड़ा है. अक्टूबर 2019 में एक युवक लापता हो गया था. इसके बाद पुलिस ने दीपक और उसके एक साथी को गिरफ्तार किया. दोनों पर अपहरण, हत्या और सबूत मिटाने के आरोप लगाए गए. पुलिस ने दावा किया कि आरोपियों ने युवक को अगवा किया, फिरौती मांगी और बाद में उसकी हत्या कर शव जला दिया. इसी मामले में दीपक नवंबर 2019 से जेल में बंद था.

जांच में कहां हुई बड़ी चूक?

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की जांच से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की. अदालत ने पाया कि शुरुआती एफआईआर में दीपक का नाम नहीं था. शुरुआती गवाहों के बयानों में भी उसका जिक्र नहीं मिला. इतना ही नहीं, 50 लाख रुपये की फिरौती मांगने की बात का स्पष्ट आधार पुलिस रिकॉर्ड में नहीं था. अदालत ने जांच को गंभीर खामियों से भरा बताया.

न डीएनए जांच, न पुख्ता सबूत

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जली हुई हड्डियों को पीड़ित का अवशेष बताया गया लेकिन उनकी डीएनए जांच नहीं कराई गई. मौत का समय और कारण भी वैज्ञानिक तरीके से साबित नहीं किया गया. कथित तौर पर 55 लीटर पेट्रोल खरीदने के दावे की भी ठीक से जांच नहीं हुई. वहीं सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को पेश करने में भी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया.

डीजीपी और गृह सचिव को भेजा जाएगा फैसला

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि पुलिस का काम केवल किसी को दोषी साबित करना नहीं बल्कि निष्पक्ष जांच करके न्याय सुनिश्चित करना है. अदालत ने फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के डीजीपी और गृह सचिव को भेजने का निर्देश दिया, ताकि ऐसी गलतियां दोबारा न हों. साथ ही सरकार को दीपक को छह लाख रुपये देने का आदेश दिया गया.

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