हीरोइन बनकर छाईं, प्यार भी हुआ… फिर क्यों नहीं की शादी? आशा पारेख की जिंदगी के 5 अनसुने किस्से
Asha Parekh: हिंदी सिनेमा की ‘हिट गर्ल’ कही जाने वाली आशा पारेख ने जब बड़े पर्दे पर कदम रखा तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन वह इंडस्ट्री की सबसे चर्चित एक्ट्रेस की लिस्ट में शामिल होंगी. खूबसूरत अंदाज, शानदार डांस और दमदार एक्टिंग ने उन्हें 60 और 70 के दशक की बड़ी स्टार बना दिया. हालांकि पर्दे पर हमेशा खिलखिलाती नजर आने वाली आशा की असल जिंदगी में संघर्ष, अधूरा प्यार और विवादों के कई अध्याय रहे हैं.
हीरोइन बनने से पहले मिला था रिजेक्शन
आशा पारेख ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम शुरू किया था लेकिन जब उन्होंने बतौर लीड एक्ट्रेस आगे बढ़ने की कोशिश की तो उन्हें बड़ा झटका लगा. फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' के लिए उन्हें साइन किया गया और 11 रुपये बतौर साइनिंग अमाउंट मिले. कुछ शूटिंग के बाद ही निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें यह कहते हुए फिल्म से हटा दिया कि वह 'स्टार मटीरियल' नहीं हैं. आशा ने बाद में बताया कि इस घटना ने उन्हें काफी निराश किया था. फिर किस्मत बदली और 'दिल देके देखो' में शम्मी कपूर के साथ उन्हें बड़ा मौका मिला. फिल्म सफल हुई और इसके बाद आशा पारेख ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
प्यार के बाद भी नहीं हुई शादी
आशा पारेख की निजी जिंदगी का सबसे चर्चित अध्याय फिल्ममेकर नासिर हुसैन से जुड़ा रहा. आशा ने अपनी किताब और कई इंटरव्यू में स्वीकार किया कि वह नासिर हुसैन से प्यार करती थीं. दोनों ने साथ में कई सफल फिल्मों पर काम किया. नासिर पहले से शादीशुदा थे. आशा ने साफ कहा कि वह उनके परिवार को तोड़ना या उनके बच्चों को किसी तरह का दुख नहीं देना चाहती थीं. इसी वजह से दोनों के रिश्ते ने शादी का रूप नहीं लिया. 2026 में भी आशा ने इस रिश्ते पर बात करते हुए नासिर को अपनी जिंदगी का इकलौता प्यार बताया.
शादी के लिए नहीं बनी बात
ऐसा नहीं था कि आशा पारेख ने कभी शादी करने के बारे में सोचा ही नहीं. उन्होंने बताया था कि उनकी मां भी चाहती थीं कि उनकी शादी हो। उनके लिए कुछ रिश्ते देखे गए लेकिन कोई रिश्ता उन्हें सही नहीं लगा. एक अमेरिकी भारतीय प्रोफेसर के साथ उनकी शादी की बात लगभग तय हो गई थी लेकिन बाद में पता चला कि वह पहले से किसी और रिश्ते में थे। यह रिश्ता भी वहीं खत्म हो गया. आशा ने बाद में कहा कि उन्हें इस बात का कोई पछतावा नहीं है कि उन्होंने शादी नहीं की.
सेंसर बोर्ड के फैसलों पर हुआ विवाद
आशा पारेख का विवादों से सामना सिर्फ निजी जिंदगी में नहीं हुआ. 1998 से 2001 तक वह केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी CBFC की अध्यक्ष रहीं. इस दौरान उनके कुछ फैसलों को लेकर फिल्म इंडस्ट्री में बहस हुई. उन्हें आलोचना का सामना भी करना पड़ा और कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि उनके सख्त रुख के कारण उन्हें 'हिटलर' तक कहा गया. 'फायर' और 'बैंडिट क्वीन' जैसी फिल्मों से जुड़े सेंसर विवादों के दौर में उनकी भूमिका भी चर्चा में रही. हालांकि, इन मामलों में अलग-अलग पक्षों की अपनी दलीलें थीं.
मिले कई अवॉर्ड
आशा पारेख ने 'कटी पतंग', 'तीसरी मंजिल', 'कारवां', 'लव इन टोक्यो' जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई. बाद के दौर में उन्होंने टीवी, निर्देशन और निर्माण से भी जुड़कर काम किया. उन्हें पद्मश्री और दादा साहब फाल्के पुरस्कार जैसे बड़े सम्मान मिले.