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बिहार की 6 बेटियों ने रचा इतिहास; गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार दिखा महिला बस ड्राइवर का दम! पढ़ें इनकी संघर्ष भरी कहानी

बिहार की 6 जांबाज बेटियों ने रचा इतिहास! पटना परेड में पहली बार 'पिंक बस' की कमान महिला ड्राइवर्स के हाथ में. मुसहर समुदाय से निकलकर सफलता तक की अनकही कहानी. यहां पढ़ें

बिहार की राजधानी पटना में इस बार गणतंत्र दिवस की परेड कुछ खास और ऐतिहासिक होने जा रही है. जब गांधी मैदान में सेना और पुलिस की टुकड़ियां कदमताल करेंगी, तब वहां मौजूद लोगों की नज़रें एक ‘बबल-गम पिंक’ रंग की बस पर टिकी होंगी. इस बस की स्टेयरिंग किसी पुरुष के हाथ में नहीं, बल्कि बिहार की उन साहसी बेटियों के हाथ में होगी, जो राज्य के सबसे वंचित और हाशिए पर रहने वाले समुदाय से आती हैं. जी हाँ आपने सही पढ़ा ‘मुसहर’ समुदाय.

संघर्ष से सफलता का सफर

यह कहानी है उन 6 लड़कियों अनीता, बेबी, गायत्री, आरती, सरस्वती और रागिनी की, जो बिहार राज्य सड़क परिवहन निगम (BSRTC) की पहली महिला बस ड्राइवर बनने जा रही हैं. इन छह महिलाओं का सफर आसान नहीं रहा. बिहार के ग्रामीण इलाकों और गरीबी से जूझते मुसहर समुदाय से निकलकर भारी वाहन (HMV) चलाने तक का रास्ता सामाजिक बाधाओं से भरा था. इन सभी की उम्र 21 से 22 वर्ष के बीच है. इन्होंने 2023 में लाइट मोटर व्हीकल (LMV) और 2024 में हैवी मोटर व्हीकल (HMV) लाइसेंस हासिल किया है.

ये लडकियां बताती हैं कि इनकी इस यात्रा में सबसे बड़ा सहारा सामाजिक कार्यकर्ता सुधा वर्गीज (जिन्हें लोग ‘सुधा दीदी’ कहते हैं) बनीं हैं. उनके एनजीओ ‘नारी गुंजन’ ने इन लड़कियों को ‘मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना’ के तहत औरंगाबाद के ड्राइविंग एंड ट्रैफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (IDTR) में ट्रेनिंग दिलाने में मदद की. सुधा वर्गीज का मानना था कि सिर्फ शिक्षा ही काफी नहीं, इन लड़कियों के पास ऐसा हुनर होना चाहिए जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें.

क्या है बेबी कुमारी की कहानी

मात्र 5 फीट से कम लंबाई वाली बेबी के लिए समाज के तानों को सहना आम बात थी. लोग उनकी कद-काठी देखकर उनकी क्षमता पर शक करते थे. बेबी कहती हैं, “मैंने कभी साइकिल चलाना नहीं सीखा था, लेकिन आज मैं बस और ट्रक चला सकती हूँ. अब मुझे किसी की बातों से डर नहीं लगता, मेरा आत्मविश्वास ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है.”

क्या कहती हैं सरस्वती कुमारी

उनकी शादी पिछले साल हुई थी. अपने ससुराल वालों को यह समझाने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी कि बस चलाना कोई शर्म की बात नहीं है. आज उनके पति गर्व से अपने दोस्तों को बताते हैं कि उनकी पत्नी पिंक बस की ड्राइवर है.

गायत्री और आरती की कहानी

गायत्री और आरती ये दोनों स्नातक कर चुकी महिलाएं हैं. भूगोल और मनोविज्ञान जैसे विषयों में डिग्री होने के बावजूद इन्होंने बस ड्राइविंग को एक सम्मानजनक करियर के रूप में चुना है. गायत्री बताती हैं कि लोग आज भी ताना मारते हैं कि एक मजदूर की बेटी इस स्तर तक कैसे पहुंच गई, लेकिन वे अब इन बातों पर ध्यान नहीं देतीं.

गणतंत्र दिवस पर ऐतिहासिक शुरुआत

बता दें कि पिंक बस शुरू करने का मकसद सरकार का यही था की पिंक बस में यात्री ही नहीं बल्कि ड्राइवर और कंडक्टर भी महिलाएं ही होंगी. लेकिन महिला बस ड्राइवर की खोज में BRCTC को काफी समस्याएँ हुईं हालाँकि इन 6 महिलाओं ने बिहार की सोच को बदलने का आधारशिला रख दिया है. आपको बताते चलें कि वर्तमान में बिहार में लगभग 100 ‘पिंक बसें’ चल रही हैं, जो विशेष रूप से महिला यात्रियों के लिए हैं. महिला कंडक्टर पहले से तैनात थीं, लेकिन ड्राइवर हमेशा पुरुष ही होते थे. अब ये छह महिलाएँ इस परंपरा को बदल रही हैं. 

सोमवार को पटना के गांधी मैदान में होने वाली परेड में जब ये महिलाएँ गवर्नर और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने से बस लेकर गुजरेंगी, तो यह केवल एक परेड नहीं बल्कि बिहार की बदलती तस्वीर होगी. जैसा कि आरती कुमारी कहती हैं, “हमारे बैकग्राउंड के लोगों के लिए गवर्नर के सामने खड़ा होना एक सपने जैसा है. इस बार लोग हमें गर्व से देखने आएंगे.”

Shivani Singh

नमस्ते, मैं हूँ शिवानी सिंह. पिछले 5 से अधिक वर्षों से डिजिटल मीडिया में सब-एडिटर, एंकर और कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में सक्रिय हूँ. 'Chakde Cricket', 'InKhabar' और 'Bihari News' जैसे प्रमुख मीडिया हाउसों में काम करने के बाद, वर्तमान में मैं 'इंडिया न्यूज़' में अपनी सेवाएँ दे रही हूँ. क्रिकेट के मैदान से जुड़ी इनसाइड स्टोरीज़, मैच एनालिसिस और आंकड़ों की बारीकियों को डिकोड करना मेरी मुख्य विशेषज्ञता है. क्रिकेट के अलावा, मैं बिजनेस/फाइनेंस (मार्केट ट्रेंड्स, सरकारी योजनाएं और पर्सनल फाइनेंस), राजनीति और बॉलीवुड के ज्वलंत मुद्दों पर भी पैनी नज़र रखती हूँ. मेरा उद्देश्य हर जटिल विषय को आपके लिए आसान भाषा में प्रस्तुत करना है.

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