Gurugram Infrastructure Failure: कागज़ों पर 550 करोड़ का ड्रेनेज प्लान और ज़मीन पर 15 फ़ीट के गड्ढे! हरियाणा की 60% अर्थव्यवस्था संभालने वाला गुरुग्राम सालों से हर मानसून में क्यों डूब जाता है? जानिए इस पुरानी प्रशासनिक विफलता और गिरते इंफ्रास्ट्रक्चर की पूरी सच्चाई.
डूबता गुरुग्राम, बर्बाद होता कारोबार... फिर भी बेफिक्र हैं नेता और प्रशासन!
दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाने वाला और हरियाणा की अर्थव्यवस्था में अकेले 60% से अधिक का योगदान देने वाला गुरुग्राम हर साल मानसून में एक ही डरावने सपने के साथ जागता है. देश की ‘मिलेनियम सिटी’ और कॉरपोरेट पावरहाउस कहे जाने वाले इस शहर की पोल महज 75 एमएम वर्षा में ही खुल जाती है. कागजों पर 550 करोड़ रुपये स्वाहा हो चुके हैं, सड़कों पर 15 फीट गहरे गड्ढे बन रहे हैं और नेता-प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि हर साल घुटने टेकते इस शहर, ठप पड़ते कारोबार और करोड़ों के आर्थिक नुकसान का असली जिम्मेदार आखिर कौन है? जानिए इस प्रशासनिक नाकामी और ढहते इंफ्रास्ट्रक्चर की पूरी कड़वी सच्चाई…
गुरुग्राम में जलभराव कोई नई घटना नहीं है, बल्कि पिछले कई सालों से हर मानसून में यह कहानी दोहराई जाती है. पिछले 5 वर्षों में जलभराव रोकने और ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने के नाम पर 550 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बहा दी गई. 2019-20 में ही 280 करोड़ रुपये की “व्यापक ड्रेनेज परियोजना” मंजूर की गई थी, लेकिन 6 साल बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है. अगस्त के आखिरी सप्ताह में दिल्ली-जयपुर हाईवे के पास इफको चौक सर्विस रोड पर जमीन धंस गई, जिससे 15 फीट गहरा और 10 फीट चौड़ा भयानक सिंकहोल बन गया. इसे ठीक करने में ही 15 दिन का समय और पूरा ट्रैफ़िक ठप हो गया.
सुभाष चौक, राजीव चौक, हीरो होंडा चौक, महावीर चौक, सोहना रोड, गोल्फ कोर्स रोड और मेदांता रोड अंडरपास जैसी जगहें आज भी जलमग्न हो जाती हैं. कमर तक भरे पानी में कारें बंद हो जाती हैं और मासूम बच्चों को स्कूली बसों से गोद में उठाकर निकालना पड़ता है.
पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि गुरुग्राम में पानी भरने का असली कारण अत्यधिक कंक्रीटीकरण और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था का विनाश है. Survey of India के 1976 के रिकॉर्ड के अनुसार गुरुग्राम में 519 जल निकाय थे. 2018 तक इनकी संख्या घटकर 251 रह गई और MCG के सर्वे के मुताबिक 65 से ज्यादा तालाब सीधे निर्माण कार्य के नीचे दफन कर दिए गए.
अरावली की पहाड़ियों से आने वाले प्राकृतिक पानी का रास्ता बिल्डरों, नेताओं और अफसरों की साठगांठ से बहुमंजिला इमारतों के नीचे दबा दिया गया.
गुरुग्राम मास्टर प्लान 2031 के तहत शहर का 60% हिस्सा कंक्रीट से ढक दिया जाएगा. जब जमीन में पानी सोखने की क्षमता ही नहीं बचेगी, तो सड़कों पर सैलाब आना स्वाभाविक है.
गुरुग्राम की इस दुर्दशा के पीछे प्रशासनिक एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय की भारी कमी और जवाबदेही का न होना सबसे बड़ा कारण है. GMDA, MCG, HSVP, NHAI और सिंचाई विभाग जैसी 5 अलग-अलग एजेंसियां अपने-अपने दायरे में काम करती हैं और इनके बीच किसी एकीकृत ड्रेनेज नेटवर्क का अभाव है. हर दो महीने में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में GMDA की समीक्षा बैठकें होने के बावजूद मानसून आते ही सभी प्रशासनिक दावे हवा हो जाते हैं. इस प्रशासनिक नाकामी के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी स्थायी समाधान निकालने में पूरी तरह विफल साबित हुए हैं.
गुरुग्राम के भाजपा सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह का हालिया बयान इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘गुरुग्राम में जलभराव वर्षों से हो रहा है… हम आज भी कांग्रेस शासन के दौरान हुए इस विकास के दुष्परिणाम भुगत रहे हैं… अभी हम जो कर रहे हैं वह महज ‘बैंड-एड’ (कामचलाऊ) समाधान है और इसका एकमात्र हल मेट्रो की तर्ज पर underground tunnels बनाना है.” सालों से सत्ता में रहने के बाद भी समाधान खोजने के बजाय पुरानी सरकारों पर दोष मढ़ना और ‘बैंड-एड’ उपायों के सहारे रहना यह साबित करता है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि केवल बयानों तक सीमित हैं और धरातल पर शहर को राहत दिलाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं’
जब पूरा शहर पानी में डूब जाता है, तो इसका सबसे सीधा और भयानक असर स्थानीय व्यापार, स्टार्टअप्स और कॉरपोरेट गतिविधियों पर पड़ता है.
सड़कों के बंद होने और निर्माण कार्यों के कारण स्थानीय वेंडर्स और दुकानदारों की बिक्री पूरी तरह ठप हो जाती है. इफको चौक पर दुकान चलाने वाले 18 साल के बिल्लू जैसे छोटे व्यापारियों का कहना है कि बसें और ग्राहक न आने से उनका बिजनेस पूरी तरह ठप्प हो चुका है.
बारिश होते ही सड़कें घंटों लंबे ट्रैफिक जाम में बदल जाती हैं. लोग 3 से 4 घंटे जाम में फंसते हैं, जिससे दफ्तरों की मीटिंग्स कैंसिल होती हैं, सप्लाई चेन और डिलीवरी में देरी होती है.
कंपनियों को मजबूरी में वर्क फ्रॉम होम घोषित करना पड़ता है. हालांकि WFH एक विकल्प है, लेकिन लॉजिस्टिक्स, ऑन-साइट ऑपरेशन्स और सर्विस सेक्टर से जुड़े व्यवसायों को हर बारिश में करोड़ों रुपये का प्रत्यक्ष नुकसान उठाना पड़ता है.
गुरुग्राम हरियाणा के राजस्व में 60% का योगदान देता है और देश में तीसरा सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय वाला शहर है. अगर अंतरराष्ट्रीय निवेशक और global CEOs घंटों पानी भरे जाम में फंसे रहेंगे, तो ‘इन्वेस्टमेंट हब’ के रूप में शहर की साख पर गहरा धक्का लगता है.
इंजीनियरिंग के नाम पर सिर्फ नए कंक्रीट के नाले बनाना या पंप लगाना अस्थायी समाधान है. जब तक शहर के प्राकृतिक जल निकायों (ponds & johads) और अरावली क्रीक (Aravalli Creek) जैसे प्राकृतिक नालों को पुनर्जीवित नहीं किया जाएगा,
सभी 5 प्रशासनिक एजेंसियों के ऊपर एक सिंगल अथॉरिटी को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा और वाटर सेंसिटिव अर्बन डिजाइन (Water Sensitive Urban Design) को लागू नहीं किया जाएगा, तब तक गुरुग्राम हर साल मानसून में इसी तरह तैरता रहेगा और ‘मिलनियम सिटी’ का टैग सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा.
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