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जाति के नाम से बुलाना कब अपराध नहीं? इलाहाबाद हाई कोर्ट का SC/ST एक्ट पर अहम फैसला

Allahabad High Court on SC/ST Act: देश में SC/ST एक्ट को लेकर कड़े कानून हैं, जिनमें जाति-आधारित अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर कड़ी सज़ा का प्रावधान है. इसी संदर्भ में, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में एक अहम आदेश जारी किया है. कोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी को सिर्फ़ उसकी जाति के नाम से बुलाना SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जाएगा.

Allahabad High Court SC/ST Judgement: देश में SC/ST एक्ट को लेकर कड़े कानून हैं, जिनमें जाति-आधारित अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर कड़ी सज़ा का प्रावधान है. इसी संदर्भ में, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में एक अहम आदेश जारी किया है. कोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी को सिर्फ़ उसकी जाति के नाम से बुलाना SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जाएगा.
लेकिन, बशर्ते ऐसा करने का मकसद न तो अपमान करना हो, न ही डराना-धमकाना या नीचा दिखाना हो. कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों को आगे बढ़ने देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा. नतीजतन, कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामला रद्द कर दिया.

SC/ST एक्ट के एक मामले में अहम आदेश

खास तौर पर, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह सिद्धार्थ नगर के रहने वाले अमय पांडे और तीन अन्य लोगों द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहे थे. उन्होंने SC/ST एक्ट के तहत उन सभी के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी. हालांकि, कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि गाली-गलौज और मारपीट के आरोपों से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी. यह ध्यान देने वाली बात है कि बहस के दौरान, याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि यह मामला शुरू में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज किया गया था.
FIR में जाति-आधारित अपमान से जुड़ा कोई आरोप नहीं था. यह खास आरोप बाद में CrPC की धारा 161 के तहत बयान दर्ज करते समय जोड़ा गया था. आरोप लगाया गया था कि एक शादी समारोह के दौरान पीड़ित का जाति-आधारित शब्दों का इस्तेमाल करके अपमान किया गया था; हालांकि, इस दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका.

मामला अब सिर्फ़ मारपीट और गाली-गलौज के आरोपों पर चलेगा

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में लगाए गए आरोपों में SC/ST एक्ट के तहत अपराध साबित करने के लिए ज़रूरी तत्व मौजूद नहीं थे. कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि कोई भी आपराधिक अपराध सिर्फ़ सबूतों के आधार पर ही साबित होना चाहिए. तदनुसार, कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत याचिकाकर्ताओं के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी. अब यह मामला सिर्फ़ मारपीट और गाली-गलौज से जुड़े आरोपों के आधार पर ही आगे बढ़ेगा.

कोर्ट में सरकारी वकील की दलीलें

खास बात यह है कि अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट से भी नहीं हुई थी. सरकारी वकील ने यह तर्क दिया कि प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है, क्योंकि विशेष अदालत ने पुलिस की चार्जशीट का संज्ञान लेने के बाद समन जारी किए थे. इसके जवाब में, अदालत ने यह टिप्पणी की कि इस दावे की पुष्टि करने के लिए बिल्कुल भी कोई सबूत नहीं था कि इस विवाद में जाति से जुड़े कोई मुद्दे शामिल थे.
इसके अलावा, अदालत ने SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(Da) के तहत अपीलकर्ताओं के खिलाफ ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी किए गए समन आदेश को रद्द कर दिया; साथ ही यह निर्देश भी दिया कि IPC की धारा 147, 323 और 504 के तहत आने वाले अपराधों से संबंधित कार्यवाही, हालांकि, कानून के अनुसार जारी रहेगी.
Shristi S

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