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Kannauj Perfumes: लखनऊ से 130km दूर बसे शहर की ‘खूशबू’ से महकती है दुनिया, 5000 साल पुराना है इतिहास; मुगलों से है खास कनेक्शन

Kannauj Perfumes: नूरजहां के पानी में गुलाब के फूल व अन्य फूलों को मिलाया जाता था. उन्होंने इस पर शोध और इत्र के विस्तार पर काम करवाया.

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Published: October 31, 2026 17:27:03 IST
Last Updated: October 31, 2026 17:27:03 IST

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Kannauj Perfumes: लखनऊ की शामें भले ही मशहूर हैं, लेकिन राजधानी से 130 किलोमीटर दूर बसे कन्नौज जिले के इत्र की महक देश-दुनिया में महसूस की जाती है. लोग इत्र (पर्फ्यूम) का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में कानपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर एक ऐसा शहर बसा है, जिसके बारे में शायद ही किसी भारतीय ने सुना हो. फिर भी इस शहर ने खुशबू की दुनिया में अपनी एक अलग वैश्विक पहचान बनाई है.कन्नौज को पूरे देश में ‘भारत की इत्र राजधानी’ (Perfume Capital of India) के रूप में जाना जाता है. हाल के वर्षों में उद्योग जगत के विभिन्न अनुमानों के अनुसार, यहाx का इत्र व्यापार हर साल काफी बड़ा कारोबार करता है. हालांकि, अक्सर बताई जाने वाली 1,000 करोड़ रुपये से अधिक के सालाना कारोबार की बात की आधिकारिक सरकारी या उद्योग संबंधी आंकड़ों से पुष्टि नहीं हो पाती है. ऐसे में इसे एक पक्के आंकड़े के बजाय केवल एक अनुमान या आम तौर पर दोहराई जाने वाली बात ही माना जाना चाहिए. 

इस कला के पीछे के लंबे इतिहास पर कोई संदेह नहीं है. कन्नौज का इत्र बनाने से नाता 7वीं सदी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल से जुड़ा है. बाद में मुगल काल में खासकर सम्राट जहांगीर और महारानी नूरजहां के संरक्षण में यहां के इत्र व्यापार ने खूब तरक्की की. माना जाता है कि गुलाब के इत्र (गुलाब अत्तर) को एक बेहतरीन शाही कला का रूप देने का श्रेय इन्हीं को जाता हैं. यहां के कुछ इत्र निर्माताओं का तो यह भी दावा है कि उनका परिवार 30 पीढ़ियों से इस काम से जुड़ा हुआ है. करीब 5000 साल से भी ज्यादा पुराना इस इत्र का इतिहास है.

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फ्रांस से भी पुरानी है तकनीक

कन्नौज की सबसे खास बात सिर्फ इसका पुराना इतिहास नहीं है, बल्कि यह है कि इसने आज भी अपनी पुरानी और पारंपरिक विधि को पूरी तरह से अपनाए रखा है. यहां का पारंपरिक इत्र (अत्तर) आज भी ‘देग-भपका’ (deg bhapka) तकनीक से बनाया जाता है. यह एक धीमी और मेहनत वाली ‘हाइड्रो डिस्टिलेशन’ (भाप द्वारा आसवन) प्रक्रिया है, जो फ्रांस के ग्रास (Grasse) शहर की मशहूर इत्र निर्माण परंपरा से भी कहीं अधिक पुरानी है. इस विधि में फूलों की पंखुड़ियों और पानी को तांबे के एक बर्तन में रखा जाता है, जिसे ‘देग’ (deg) कहते हैं. इस बर्तन को मिट्टी से सील कर दिया जाता है और फिर लकड़ी या गोबर के उपलों की आग पर गर्म किया जाता है, जिससे निकलने वाली खुशबूदार भाप ‘चोंगा’ (chonga) नामक एक मुड़ी हुई बांस की नली से होकर दूसरे बर्तन में जाती है, जिसे ‘भपका’ (bhapka) कहा जाता है. यह बर्तन ठंडे पानी से भरे एक कुंड में रखा होता है. ‘भपका’ के अंदर शुद्ध चंदन के तेल का आधार (base) होता है, जो धीरे-धीरे भाप में मौजूद खुशबू को सोख लेता है और अंत में ‘अत्तर’ तैयार हो जाता है.

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शॉर्ट कट नहीं तसल्ली से बनाया जाता है पर्फ्यूम

 आजकल के अल्कोहल-आधारित परफ्यूम से अलग तेल पर आधारित इस पारंपरिक तरीके में कोई बनावटी शॉर्टकट नहीं होता. एक छोटी सी बोतल तैयार करने में भी 2 हफ्तों तक का धैर्यपूर्ण और बारीकी से किया जाने वाला काम लगता है. एक बोतल के पीछे का हैरान करने वाला गणित यह है कि इसे बनाने के लिए कच्चे माल की मात्रा इतनी अधिक होती है कि उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. कहा जाता है कि सिर्फ एक किलोग्राम शुद्ध गुलाब का इत्र बनाने के लिए कई हजार किलोग्राम गुलाब की पंखुड़ियों की जरूरत होती है. इन्हें सुबह-सुबह तब तोड़ा जाता है जब इनकी खुशबू सबसे तेज होती है, क्योंकि दिन चढ़ने के साथ गुलाब की महक कम होने लगती है. इतनी मेहनत और समय लगने के कारण ही असली इत्र एक प्रीमियम उत्पाद है, न कि बड़े पैमाने पर मशीनों से बनने वाली कोई आम चीज.

बताया जाता है कि गुलाब और चमेली के अलावा, कन्नौज के इत्र बनाने वाले एक और बहुत ही अनोखी चीज के लिए जाने जाते हैं. ‘मिट्टी का इत्र’ – यानी सूखी धरती पर पहली बारिश गिरने से आने वाली सोंधी महक। पश्चिमी वैज्ञानिकों द्वारा इस खुशबू के लिए ‘पेट्रीकोर’ (petrichor) शब्द गढ़े जाने से बहुत पहले ही कन्नौज के कारीगरों ने जान लिया था कि पकी हुई मिट्टी को डिस्टिल (आसवन) करके इस खुशबू को कैसे कैद किया जाए. उन्होंने प्रकृति के इस पल भर के अहसास को एक बोतल में बंद कर दिया, जो आज कन्नौज की सबसे खास पहचान बन गई है। एक ऐसा कारोबार जो आज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है और धीरे-धीरे फिर से संभलने की कोशिश कर रहा है। कन्नौज की कहानी सिर्फ लगातार सफलता की कहानी नहीं है.

आर्थिक उदारीकरण ने भी बदली कारोबार की सूरत 

आंकड़ों के अनुसार, 1980 के दशक के आखिर में आर्थिक उदारीकरण से पहले यहां लगभग 700 डिस्टिलरी (इत्र बनाने की इकाइयां) काम करती थीं। लेकिन फिर भारतीय बाजार में सस्ते, अल्कोहल-आधारित पश्चिमी परफ्यूम आ गए. 2000 के दशक के मध्य तक, इनकी संख्या घटकर 150 से 200 के बीच रह गई, क्योंकि लोगों की पसंद बदल गई और कच्चा माल, खासकर चंदन बहुत दुर्लभ और महंगा हो गया. हालांकि, हाल के वर्षों में इस कला को बचाने और बढ़ावा देने के लिए नए सिरे से प्रयास किए गए हैं। कन्नौज के इत्र को 2013-2014 में भारत के ‘GI एक्ट’ (भौगोलिक संकेतक अधिनियम) के तहत आधिकारिक सुरक्षा मिली, जिससे इसकी पहचान को कानूनी संरक्षण मिल गया.

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कन्नौज से कई देशों में निर्यात होता है इत्र

 उत्तर प्रदेश सरकार ने कन्नौज को अपनी ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (One District One Product) योजना में शामिल किया है. इसके तहत आधुनिक पैकेजिंग सुविधाओं, ई-कॉमर्स प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रदर्शनियों में भागीदारी के जरिए मदद दी जा रही है. इसका मकसद पारंपरिक इत्र निर्माताओं को बिचौलियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय सीधे वैश्विक बाजारों तक पहुंचने में सक्षम बनाना है. वर्तमान में कन्नौज के इत्र और उन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल भारत के बाहर भी काफी लोकप्रिय हैं. खासकर मध्य पूर्व (Middle East) में  जहां संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देश भारतीय इत्र के सबसे बड़े आयातकों में से एक हैं.

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इसके अलावा, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के इत्र निर्माता भी प्राकृतिक और पारंपरिक तरीके से तैयार सामग्री में रुचि दिखा रहे हैं और यह मांग लगातार बढ़ रही है. एक ऐसी खुशबू जिसने हर दौर को पार कर लिया है. आज कन्नौज की अर्थव्यवस्था के आंकड़े चाहे जो भी हों, इसकी असली कहानी एक अद्भुत निरंतरता की है. एक ऐसी दुनिया में जहां इत्र का उत्पादन अब बड़े पैमाने पर औद्योगिक और रासायनिक प्रक्रियाओं पर आधारित हो गया है, उत्तर प्रदेश का यह छोटा सा शहर आज भी तांबे के बर्तनों, बांस की नलियों और उन तकनीकों का उपयोग करता है, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं.

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Published: October 31, 2026 17:27:03 IST
Last Updated: October 31, 2026 17:27:03 IST

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Kannauj Perfumes: लखनऊ की शामें भले ही मशहूर हैं, लेकिन राजधानी से 130 किलोमीटर दूर बसे कन्नौज जिले के इत्र की महक देश-दुनिया में महसूस की जाती है. लोग इत्र (पर्फ्यूम) का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में कानपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर एक ऐसा शहर बसा है, जिसके बारे में शायद ही किसी भारतीय ने सुना हो. फिर भी इस शहर ने खुशबू की दुनिया में अपनी एक अलग वैश्विक पहचान बनाई है.कन्नौज को पूरे देश में ‘भारत की इत्र राजधानी’ (Perfume Capital of India) के रूप में जाना जाता है. हाल के वर्षों में उद्योग जगत के विभिन्न अनुमानों के अनुसार, यहाx का इत्र व्यापार हर साल काफी बड़ा कारोबार करता है. हालांकि, अक्सर बताई जाने वाली 1,000 करोड़ रुपये से अधिक के सालाना कारोबार की बात की आधिकारिक सरकारी या उद्योग संबंधी आंकड़ों से पुष्टि नहीं हो पाती है. ऐसे में इसे एक पक्के आंकड़े के बजाय केवल एक अनुमान या आम तौर पर दोहराई जाने वाली बात ही माना जाना चाहिए. 

इस कला के पीछे के लंबे इतिहास पर कोई संदेह नहीं है. कन्नौज का इत्र बनाने से नाता 7वीं सदी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल से जुड़ा है. बाद में मुगल काल में खासकर सम्राट जहांगीर और महारानी नूरजहां के संरक्षण में यहां के इत्र व्यापार ने खूब तरक्की की. माना जाता है कि गुलाब के इत्र (गुलाब अत्तर) को एक बेहतरीन शाही कला का रूप देने का श्रेय इन्हीं को जाता हैं. यहां के कुछ इत्र निर्माताओं का तो यह भी दावा है कि उनका परिवार 30 पीढ़ियों से इस काम से जुड़ा हुआ है. करीब 5000 साल से भी ज्यादा पुराना इस इत्र का इतिहास है.

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फ्रांस से भी पुरानी है तकनीक

कन्नौज की सबसे खास बात सिर्फ इसका पुराना इतिहास नहीं है, बल्कि यह है कि इसने आज भी अपनी पुरानी और पारंपरिक विधि को पूरी तरह से अपनाए रखा है. यहां का पारंपरिक इत्र (अत्तर) आज भी ‘देग-भपका’ (deg bhapka) तकनीक से बनाया जाता है. यह एक धीमी और मेहनत वाली ‘हाइड्रो डिस्टिलेशन’ (भाप द्वारा आसवन) प्रक्रिया है, जो फ्रांस के ग्रास (Grasse) शहर की मशहूर इत्र निर्माण परंपरा से भी कहीं अधिक पुरानी है. इस विधि में फूलों की पंखुड़ियों और पानी को तांबे के एक बर्तन में रखा जाता है, जिसे ‘देग’ (deg) कहते हैं. इस बर्तन को मिट्टी से सील कर दिया जाता है और फिर लकड़ी या गोबर के उपलों की आग पर गर्म किया जाता है, जिससे निकलने वाली खुशबूदार भाप ‘चोंगा’ (chonga) नामक एक मुड़ी हुई बांस की नली से होकर दूसरे बर्तन में जाती है, जिसे ‘भपका’ (bhapka) कहा जाता है. यह बर्तन ठंडे पानी से भरे एक कुंड में रखा होता है. ‘भपका’ के अंदर शुद्ध चंदन के तेल का आधार (base) होता है, जो धीरे-धीरे भाप में मौजूद खुशबू को सोख लेता है और अंत में ‘अत्तर’ तैयार हो जाता है.

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शॉर्ट कट नहीं तसल्ली से बनाया जाता है पर्फ्यूम

 आजकल के अल्कोहल-आधारित परफ्यूम से अलग तेल पर आधारित इस पारंपरिक तरीके में कोई बनावटी शॉर्टकट नहीं होता. एक छोटी सी बोतल तैयार करने में भी 2 हफ्तों तक का धैर्यपूर्ण और बारीकी से किया जाने वाला काम लगता है. एक बोतल के पीछे का हैरान करने वाला गणित यह है कि इसे बनाने के लिए कच्चे माल की मात्रा इतनी अधिक होती है कि उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. कहा जाता है कि सिर्फ एक किलोग्राम शुद्ध गुलाब का इत्र बनाने के लिए कई हजार किलोग्राम गुलाब की पंखुड़ियों की जरूरत होती है. इन्हें सुबह-सुबह तब तोड़ा जाता है जब इनकी खुशबू सबसे तेज होती है, क्योंकि दिन चढ़ने के साथ गुलाब की महक कम होने लगती है. इतनी मेहनत और समय लगने के कारण ही असली इत्र एक प्रीमियम उत्पाद है, न कि बड़े पैमाने पर मशीनों से बनने वाली कोई आम चीज.

बताया जाता है कि गुलाब और चमेली के अलावा, कन्नौज के इत्र बनाने वाले एक और बहुत ही अनोखी चीज के लिए जाने जाते हैं. ‘मिट्टी का इत्र’ – यानी सूखी धरती पर पहली बारिश गिरने से आने वाली सोंधी महक। पश्चिमी वैज्ञानिकों द्वारा इस खुशबू के लिए ‘पेट्रीकोर’ (petrichor) शब्द गढ़े जाने से बहुत पहले ही कन्नौज के कारीगरों ने जान लिया था कि पकी हुई मिट्टी को डिस्टिल (आसवन) करके इस खुशबू को कैसे कैद किया जाए. उन्होंने प्रकृति के इस पल भर के अहसास को एक बोतल में बंद कर दिया, जो आज कन्नौज की सबसे खास पहचान बन गई है। एक ऐसा कारोबार जो आज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है और धीरे-धीरे फिर से संभलने की कोशिश कर रहा है। कन्नौज की कहानी सिर्फ लगातार सफलता की कहानी नहीं है.

आर्थिक उदारीकरण ने भी बदली कारोबार की सूरत 

आंकड़ों के अनुसार, 1980 के दशक के आखिर में आर्थिक उदारीकरण से पहले यहां लगभग 700 डिस्टिलरी (इत्र बनाने की इकाइयां) काम करती थीं। लेकिन फिर भारतीय बाजार में सस्ते, अल्कोहल-आधारित पश्चिमी परफ्यूम आ गए. 2000 के दशक के मध्य तक, इनकी संख्या घटकर 150 से 200 के बीच रह गई, क्योंकि लोगों की पसंद बदल गई और कच्चा माल, खासकर चंदन बहुत दुर्लभ और महंगा हो गया. हालांकि, हाल के वर्षों में इस कला को बचाने और बढ़ावा देने के लिए नए सिरे से प्रयास किए गए हैं। कन्नौज के इत्र को 2013-2014 में भारत के ‘GI एक्ट’ (भौगोलिक संकेतक अधिनियम) के तहत आधिकारिक सुरक्षा मिली, जिससे इसकी पहचान को कानूनी संरक्षण मिल गया.

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कन्नौज से कई देशों में निर्यात होता है इत्र

 उत्तर प्रदेश सरकार ने कन्नौज को अपनी ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (One District One Product) योजना में शामिल किया है. इसके तहत आधुनिक पैकेजिंग सुविधाओं, ई-कॉमर्स प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रदर्शनियों में भागीदारी के जरिए मदद दी जा रही है. इसका मकसद पारंपरिक इत्र निर्माताओं को बिचौलियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय सीधे वैश्विक बाजारों तक पहुंचने में सक्षम बनाना है. वर्तमान में कन्नौज के इत्र और उन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल भारत के बाहर भी काफी लोकप्रिय हैं. खासकर मध्य पूर्व (Middle East) में  जहां संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देश भारतीय इत्र के सबसे बड़े आयातकों में से एक हैं.

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इसके अलावा, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के इत्र निर्माता भी प्राकृतिक और पारंपरिक तरीके से तैयार सामग्री में रुचि दिखा रहे हैं और यह मांग लगातार बढ़ रही है. एक ऐसी खुशबू जिसने हर दौर को पार कर लिया है. आज कन्नौज की अर्थव्यवस्था के आंकड़े चाहे जो भी हों, इसकी असली कहानी एक अद्भुत निरंतरता की है. एक ऐसी दुनिया में जहां इत्र का उत्पादन अब बड़े पैमाने पर औद्योगिक और रासायनिक प्रक्रियाओं पर आधारित हो गया है, उत्तर प्रदेश का यह छोटा सा शहर आज भी तांबे के बर्तनों, बांस की नलियों और उन तकनीकों का उपयोग करता है, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं.

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