Nithari Murder Case: आज भी, जब दिल्ली से 20 किलोमीटर दूर नोएडा में निठारी हत्याकांड का ज़िक्र आते ही कई लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. 29 दिसंबर, 2006 को, व्यवसायी मोहिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे स्थित एक नाले से आठ बच्चों के कंकाल बरामद किए गए थे. यहीं से एक बेहद भयानक और घिनौने अपराध के पीछे की सच्चाई सामने आई थी.
निठारी की घटना को इतिहास पर एक शर्मनाक दाग के तौर पर हमेशा याद रखा जाएगा, यह बच्चों और छोटी बच्चियों के साथ की गई बर्बर क्रूरता का प्रतीक है. 2005 और 2006 के बीच, दर्जनों बच्चे लापता हो गए थे; इनमें से ज़्यादातर पीड़ितों के शव बाद में उसी नाले और आस-पास के इलाकों से बरामद किए गए थे. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें पूरी कहानी.
क्या है पूरा मामला?
इस कांड के केंद्र में दो नाम थे- मोहिंदर सिंह पंढेर और उसका घरेलू नौकर, सुरेंद्र कोली. पंढेर एक अमीर व्यवसायी था, जिसका सेक्टर 31, निठारी में एक डुप्लेक्स घर था. कोली उसके घर में चपरासी का काम करता था. जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि कोली बच्चों को बहला-फुसलाकर घर के अंदर ले जाता था, उनका यौन शोषण करता था, उनकी हत्या कर देता था, और बाद में उनके शवों को नाले में फेंक देता था. पंढेर पर भी अपराध में सहयोग करने का आरोप लगाया गया था. कोली को तो नरभक्षी तक कहा जाने लगा था, क्योंकि कथित तौर पर वह अपने पीड़ितों के शवों का मांस खाता था. हालांकि, पूरा मामला काफ़ी हद तक गवाहों के बयानों और कोली के अपने इकबालिया बयान पर टिका था ऐसे सबूत जो बाद में काफ़ी विवादित साबित हुए.
16 मामले और मौत की सज़ा
निठारी हत्याकांड के संबंध में कुल 16 से ज़्यादा मामले दर्ज किए गए थे, हालांकि कानूनी कार्यवाही मुख्य रूप से उन 13 मामलों पर केंद्रित थी, जिनका फ़ैसला निचली अदालतों में हुआ था. CBI ने जांच की कमान संभाली, और कोली को इनमें से 13 मामलों में मौत की सज़ा सुनाई गई. निचली अदालतों ने ये सज़ाएं 2009 और 2010 के बीच सुनाई थीं. उदाहरण के लिए, कोली को 15 साल की रिम्पा हलदर के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में मौत की सज़ा सुनाई गई थी. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कुछ मामलों में दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन पांढेर को कई अन्य मामलों में बरी कर दिया गया. 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने कई दोषसिद्धियों की पुष्टि की. कोली ने 16 साल मौत की सज़ा वाली कोठरी में बिताए; हालांकि, उसकी दया याचिका पर कार्रवाई में देरी के कारण, 2015 में उसकी मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया.
सज़ा सुनाए जाने के बाद भी सवाल बने रहे
मौत की सज़ा सुनाए जाने के बावजूद, इस मामले में कई खामियां सामने आईं. आरोप लगाया गया कि कोली का इकबालिया बयान ज़बरदस्ती लिया गया था. जांच DNA नमूनों के कुप्रबंधन से प्रभावित थी, और शवों की पहचान निश्चित रूप से स्थापित नहीं की जा सकी. CBI की एक रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस ने शुरू में लापता व्यक्तियों को घर से भागे हुए मान लिया था. पीड़ितों के परिवारों में भारी आक्रोश फैल गया, जिन्होंने तर्क दिया कि जहां एक तरफ कम आय वाले इलाके के बच्चे गायब हो रहे थे, वहीं दूसरी तरफ अमीर पांढेर के घर की तलाशी में बिना किसी स्पष्ट कारण के देरी की गई. 2011 तक, कोली को दोषी ठहराया जा चुका था; फिर भी, सबूतों की कमज़ोरी को लेकर बहस जारी रही.
हाई कोर्ट में एक अहम मोड़
2023 में, इस मामले ने एक नया मोड़ लिया. 16 अक्टूबर को, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोली को 12 अलग-अलग मामलों में बरी कर दिया. कोर्ट ने टिप्पणी की कि पेश किए गए सबूत उचित संदेह से परे होने के मानक को पूरा करने में विफल रहे. कोर्ट ने कोली के इकबालिया बयान को अविश्वसनीय और बरामदगी (जैसे चाकू) को अमान्य माना. पांढेर को भी दो मामलों में बरी कर दिया गया. हाई कोर्ट ने पुलिस और CBI दोनों द्वारा की गई लापरवाह जांच के संबंध में कड़ी टिप्पणियां कीं. केवल एक मामला बचा था रिम्पा हलदर का जिसमें कोली की आजीवन कारावास की सज़ा को बरकरार रखा गया. CBI और उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की; हालांकि, जुलाई 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.
सुप्रीम कोर्ट ने उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई की
अब, केवल अंतिम मामला बचा था. कोली ने सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले को चुनौती देते हुए एक उपचारात्मक याचिका दायर की. यह उसका अंतिम कानूनी सहारा था. मुख्य न्यायाधीश बी.आर. की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने… गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ ने 7 अक्टूबर, 2025 को इस मामले की सुनवाई की.
कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर 12 मामलों में बरी होने के बाद भी, सिर्फ़ एक मामले में सज़ा बरकरार रखी जाती है, तो यह न्याय का मज़ाक होगा. सबूतों में वही कमियां थीं इकबालिया बयानों पर बहुत ज़्यादा निर्भरता, और एविडेंस एक्ट की धारा 27 के तहत की गई बरामदगियों को अमान्य माना जाना. कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया.
11 नवंबर, 2025 को एक ऐतिहासिक फ़ैसला
इसके बाद, 11 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया. कोली को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. जस्टिस विक्रम नाथ ने टिप्पणी की, शक, चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता. कोर्ट ने 2011 के फ़ैसले को, साथ ही 2014 की पुनर्विचार याचिका को खारिज करने वाले फैसले को रद्द कर दिया. जिसके बाद कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को बरी किया जाता है; उसे तुरंत रिहा किया जाए.