Mamata Banerjee TMC: पश्चिम बंगाल मे होने वाले आगामी चुनाव को लेकर टीएमसी से लेकर बीजेपी सबने कमर कसनी शुरू कर दी है. ऐसे में आइए जानते हैं कि ममता बनर्जी कांग्रेस से क्यों अलग हुई और कैसे टीएमसी का गठन हुआ?
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West Bengal Assembly Elections: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा को लेकर सभी पार्टियों ने कमर कस ली है. टीएमसी भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर कैसे टीएमसी का गठन किया? कभी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बेहद करीब रही ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर टीएमसी का गठन क्यों किया? इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह बताई जाती है कि उन्हें बंगाल कांग्रेस के नेताओं का समर्थन नहीं मिला. मतलब साफ था कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की नजरों में ममता बनर्जी के बढ़ते कद की वजह से बंगाल कांग्रेस के कई नेता नाराज थे.
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया. इसके बाद जब चुनाव का एलान हुआ तो ममता बनर्जी फिर से चुनावी तैयारियों में लग गई. जो कि बंगाल कांग्रेस के नेताओं को खटकने लगा.
पहले इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी की मौत के बाद पार्टी में उनके पक्ष मेें लड़ने वाला कोई नहीं बचा था. ममता बनर्जी का पार्टी के अंदर के लोगों द्वारा ही विरोध किया जा रहा था. एक तरफ ममता जहां सीपीएम की सरकार से लड़ती थी. तो दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी के उन नेताओं के खिलाफ लड़ती थी, जो ममता बनर्जी की तरक्की से खुश नहीं थे.
राजीव गांधी के परिवार से ममता बनर्जी का भावनात्मक लगाव था. इसलिए राजीव गांधी की मौत के बाद ममता बनर्जी कम से कम 100 बार सोनिया गांधी के आवास पर गईं. 12 दिसंबर 1997 को दिल्ली में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की मुलाकात हुई. ममता ने मौजूदा नेतृत्व से नाराजगी जताई और सोनिया गांधी से पार्टी की जिम्मेदारी संभालने को कहा लेकिन सोनिया गांधी ने यह कहकर मना कर दिया कि वह विदेशी हैं और लोग उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे.
21 जुलाई 1993 को राइटर्स बिल्डिंग के सामने हुई फायरिंग में मारे गए कार्यकर्ताओं की याद में जिला सम्मेलनों का आयोजन शुरू किया गया. जवाब में दूसरे धड़े ने कोलकाता के नेताजी इनडोर स्टेडियम में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन का एलान किया. जिसके बारे में ममता बनर्जी ने कहा कि नेता इनडोर और कार्यकर्ता आउटडोर. फिर क्या था ममता बनर्जी ने अपनी ही पार्टी को खुली चुनौती दे दी और राष्ट्रीय अधिवेशन के पेरलल कार्यकर्ताओं की एक फौज खड़ी कर दी. स्टेडियम के अंदर नेताओं का अधिवेशन चल रहा था और बाहर कार्यकर्ताओं का सम्मेलन चल रहा था. इस वाकये के बाद से ही तय हो गया था कि ममता बनर्जी अब अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ेगी.
हालांकि, ममता बनर्जी को मनाने का प्रयास किया गया लेकिन ममता ने गुपचुप तरीके से पार्टी बना ली. फिर एक दिन ममता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और एलान किया कि वह तृणमूल कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगी. 1 जनवरी 1998 को चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस को एक राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता दी. अपने पहले चुनाव में ममता बनर्जी 7 सांसदों के साथ लोकसभा पहुंची.
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