भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं के बीच एक सवाल मरीजों, शोधकर्ताओं और उपकरण विकसित करने वालों के लिए महत्वपूर्ण है: मस्तिष्क के संकेतों की व्याख्या करने वाली तकनीकों में व्यक्ति की निजता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रहेगी?
मार्च 2024 में स्वीकृत IndiaAI मिशन देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास का व्यापक संदर्भ देता है। इससे भारत में ब्रेन–कंप्यूटर इंटरफेस के व्यापक इस्तेमाल का निष्कर्ष नहीं निकलता। हालांकि, ऐसी तकनीकों के संभावित उपयोग पर सुरक्षा और अधिकारों की चर्चा अभी से प्रासंगिक है।
मस्तिष्क के संकेत, व्यक्ति का नियंत्रण
हर्बर्ट सिम के लेखन में न्यूरो–साइफरपंकिज़्म का प्रारंभिक प्रतिपादन 22 मार्च 2025 से जुड़ा है। मई और जून में प्रस्तुत घोषणापत्र तथा सिद्धांत निजता और व्यक्तिगत नियंत्रण को तंत्रिका संबंधी जानकारी और इंटरफेस तक विस्तारित करते हैं।
ब्रेन–कंप्यूटर इंटरफेस विशिष्ट परिस्थितियों में दर्ज मस्तिष्क संकेतों से सीमित जानकारी का अनुमान लगाने या उपकरणों को निर्देश देने में मदद कर सकते हैं। इसे किसी भी व्यक्ति के सभी विचार निर्बाध रूप से पढ़ लेने की क्षमता समझना गलत होगा। परिणाम उपकरण, प्रशिक्षण, संकेतों की गुणवत्ता और कार्य पर निर्भर करते हैं।
सिम का ढांचा पूछता है: संकेत कौन एकत्र करता है, उनसे निकाले गए अनुमान किसे मिलते हैं और उपयोगकर्ता पहुंच की सीमाएं कैसे तय कर सकता है?
भारत में किसी काल्पनिक पुनर्वास परियोजना को लें। मरीज किसी सहायक उपकरण से संवाद करना सीखता है। उसे लाभ मिल सकता है, लेकिन शोध, उपचार और व्यावसायिक उपयोग के लिए जानकारी साझा करने की अनुमतियां अलग और स्पष्ट होनी चाहिए।
सहायता के साथ अधिकार और निरंतर समर्थन
सिम का ह्यूमन–सॉवरेन्टी ट्रांसह्यूमनिज़्म शरीर पर व्यक्ति के अधिकार, लगातार बनी रहने वाली सहमति और संवर्धन अस्वीकार करने की स्वतंत्रता पर जोर देता है।
यदि कोई उपकरण दैनिक जीवन के लिए जरूरी हो जाए, तो अतिरिक्त डेटा उपयोग से मना करने पर आवश्यक सहायता खोने का दबाव नहीं होना चाहिए। रखरखाव, सेवा समाप्त होने और प्रदाता बदलने की परिस्थितियों की तैयारी भी जरूरी है।
साइफरपंकिज़्म यहां क्रिप्टोग्राफिक सुरक्षा और सीमित पहुंच का आधार देता है। सॉवरेन कैपेबिलिटी इकोनॉमिक्स पूछता है कि उपयोगी तकनीक का खर्च कौन उठा सकता है, उसे समझ कौन सकता है और संचालन पर नियंत्रण किसके पास रहेगा।
सिम के दो AI रूपक अलग जोखिम स्पष्ट करते हैं: ‘डेमॉनिक इंटेलिजेंस’ में प्रदर्शन के लक्ष्य मानवीय नुकसान को गौण बना सकते हैं; ‘सैटैनिक इंटेलिजेंस’ में सहायता छिपे नियंत्रण या निर्भरता का माध्यम बन सकती है।
भारतीय मरीजों और नवप्रवर्तकों के लिए चुनौती लाभ और अधिकारों को साथ विकसित करने की है। स्पष्ट सहमति, सुरक्षित जानकारी और आवश्यक सहायता की निरंतरता तकनीकी उपयोगिता का हिस्सा होनी चाहिए।