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Green Hydrogen: भारत का ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: उद्यमी इस सेक्टर में क्यों दौड़ रहे हैं

Green Hydrogen Mission: भारत का ग्रीन हाइड्रोजन मिशन देश में एक बड़ा आर्थिक, तकनीकी और ऊर्जा बदलाव ला रहा है.

Green Hydrogen Mission: भारत में चले आ रहे ऊर्जा परिवर्तन एक अहम दौर में पहुँच रहा है और यह जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है। यह 2047 तक विकसित राष्‍ट्र बनने और 2070 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्‍य हासिल करने के इसके विज़न के अनुरूप है। इस बदलाव में, ग्रीन हाइड्रोजन बड़े पैमाने पर अपनाए जा सकने वाले ईंधन के विकल्प के तौर पर उभरा है, और ऐसे क्षेत्रों को को डीकार्बनाइज़ कर सकता है, जहाँ कार्बन कम करना मुश्किल है. यह ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए भारत के लक्ष्यों में सहायता प्रदान कर सकता है।

ग्रीन हाइड्रोजन क्या है?

ग्रीन हाइड्रोजन वह हाइड्रोजन है, जिसका निर्माण जीवाश्म ईंधनों  के बजाय, सौर या पवन ऊर्जा  जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करके किया जाता है. भारत हरित हाइड्रोजन क्षेत्र में नवाचार का केंद्र बनने और उच्च मूल्य वाली नौकरियां सृजित करने की दिशा में अग्रसर है.

ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की कब हु शुरुआत

भारत सरकार ने 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (एनजीएचएम) का शुभारंभ किया, जो एक व्‍यापक  कार्यक्रम है. यह मिशन मात्र एक ऊर्जा पहल से कहीं ज्यादा है. यह औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता, आयात कम करने और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक रणनीतिक रास्ता है. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) भारत की स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन यात्रा को गति दे रहा है, जिससे रोजगार सृजन, निवेश वृद्धि और भारत को वैश्विक ‘ग्रीन हाइड्रोजन हब’ बनाने में मदद मिल रही है.

हरित हाइड्रोजन हब

बड़े पैमाने पर उत्पादन या हाइड्रोजन के उपयोग का समर्थन करने में सक्षम राज्यों एवं क्षेत्रों को हरित हाइड्रोजन हब के रूप में पहचाना तथा विकसित किया जाएगा.

ग्रीन हाइड्रोजन के लिए चुनौतियाँ

विश्व स्तर पर हरित हाइड्रोजन का विकास अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है, जबकि भारत एक प्रमुख उत्पादक होने का लक्ष्य निर्धारित कर सकता है.

सस्ते नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन

भारत में सौर और पवन ऊर्जा दुनिया में सबसे किफायती है. ग्रीन हाइड्रोजन की लागत का 60–70% हिस्सा बिजली होती है. भारत में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन इंटरनेशनल लेवल पर भी सबसे सस्ता पड़ सकता है, जिससे उद्यमी इसे “कम्पिटिटिव एडवांटेज” मानते हैं.

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