Crude Oil: अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के नतीजों के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 9% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई. इसकी वजह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान के साथ चल रहे युद्ध को खत्म करने का बढ़ता राजनीतिक दबाव माना जा रहा है. निवेशकों को उम्मीद है कि अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की बढ़त से सरकार को युद्ध पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है. इससे मध्य पूर्व में तेल की सप्लाई को लेकर बनी चिंता कम हो सकती है.
हालांकि, तेल की कीमतों में गिरावट की वजह सिर्फ अमेरिकी चुनाव नहीं है. इसके पीछे तेल की सप्लाई में सुधार और दुनिया में इसकी मांग का कमजोर होना भी बड़ी वजह है. ऐसे में सवाल है कि क्या कच्चे तेल की कीमतों में आई यह गिरावट आगे भी जारी रहेगी और इसका भारत पर क्या असर पड़ेगा?
कच्चे तेल की कीमतों में 9% की गिरावट
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बुधवार को तेज गिरावट देखने को मिली. ब्रेंट क्रूड की कीमत कारोबार के दौरान 93.22 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. बाद में यह 94.62 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ. एक दिन में इसकी कीमत में 8.7% की गिरावट दर्ज की गई.
तेल बाजार में इस गिरावट के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को लेकर बदलती उम्मीदें हैं. अमेरिकी चुनाव में डेमोक्रेट्स को कांग्रेस के दोनों सदनों में बढ़त मिलने से ट्रंप प्रशासन पर युद्ध खत्म करने का दबाव बढ़ सकता है.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी हार के पीछे ईरान युद्ध को भी एक वजह बताया. वहीं, ट्रंप ने भी माना कि युद्ध का चुनावी नतीजों पर असर पड़ा है.
इससे निवेशकों को उम्मीद है कि अमेरिका अब युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत का रास्ता अपना सकता है. हालांकि, अभी दोनों देशों के बीच किसी समझौते की संभावना स्पष्ट नहीं है.
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है अहम?
कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य की है. यह ईरान और ओमान के बीच स्थित समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल की सप्लाई होती है.
युद्ध से पहले इस रास्ते से हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता था. लेकिन युद्ध के कारण तेल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई. इससे दुनिया में तेल की कमी होने की आशंका बढ़ गई और कीमतों में तेजी आई.
अब स्थिति में कुछ सुधार हुआ है. जेपी मॉर्गन के अनुमान के मुताबिक, मध्य पूर्व से तेल का निर्यात मार्च में 98 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़कर अक्टूबर में करीब 2.07 करोड़ बैरल प्रतिदिन हो गया.यानी बाजार में तेल की सप्लाई दोबारा बढ़ रही है. इससे कीमतों पर दबाव बन रहा है.
मांग में कमी ने भी गिराए दाम
तेल की कीमतों में गिरावट की एक और वजह दुनिया में इसकी मांग का कमजोर होना है.जेपी मॉर्गन के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक स्तर पर तेल की मांग में कमी आई है. अक्टूबर में दुनिया के पास जरूरत से करीब 14 लाख बैरल प्रतिदिन ज्यादा तेल उपलब्ध था.जब बाजार में तेल की सप्लाई मांग से ज्यादा होती है, तो कीमतों में गिरावट आने लगती है. ऐसे में तेल की बढ़ती सप्लाई और कमजोर मांग ने कीमतों को नीचे लाने में अहम भूमिका निभाई है.
भारत को क्या होगा फायदा?
भारत अपनी जरूरत का करीब 89% कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बदलाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम बनी रहती हैं, तो भारत का तेल आयात बिल घट सकता है. इससे रुपये पर दबाव कम होने और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.
एयरलाइंस और ट्रांसपोर्ट जैसी कंपनियों को भी सस्ता तेल मिलने से फायदा हो सकता है, क्योंकि उनके खर्च का बड़ा हिस्सा ईंधन पर होता है.हालांकि, आम लोगों को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तुरंत राहत मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इनकी कीमतें सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं. टैक्स, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों के फैसले भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं.
(डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है और इसे वित्तीय, निवेश, कानूनी या कर संबंधी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले पाठकों को विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।)
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