कभी विशाल भारतीय क्षेत्रों पर शासन करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी दूसरी बार बंद हो गई है. लक्ज़री लाइफस्टाइल ब्रांड “द ईस्ट इंडिया कंपनी” दिवालिया हो गई है, जिसे क्रेडिटर्स’ वॉलेंटरी लिक्विडेशन (स्वेच्छा से बंद होने) के तहत बंद कर दिया गया है.
दिवालिया हुई 'द ईस्ट इंडिया कंपनी' (PC- Tripadvisor)
ब्रिटेन के लंदन स्थित लक्ज़री लाइफस्टाइल ब्रांड “द ईस्ट इंडिया कंपनी” (The East India Company) ने फिर से बिज़नेस बंद कर दिया है, जिससे 170 साल पुराने एक ऐतिहासिक नाम का नया जीवन भी खत्म हो गया. संडे टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह ब्रिटिश कॉलोनियल ट्रेडिंग फर्म का ब्रांड रीब्रैंड और रिटेल रूप में चल रहा था, लेकिन अब यह क्रेडिटर्स’ वॉलेंटरी लिक्विडेशन (स्वेच्छा से बंद होने) के तहत बंद हो गया है.
बता दें कि मूल ईस्ट इंडिया कंपनी लगभग 152 साल पहले निष्क्रिय हो गई थी, लेकिन 2010 में एक ब्रिटिश-भारतीय व्यवसायी ने नाम के अधिकार खरीदकर इसे पुनर्जीवित किया था. दिवालिया होने के बाद अब ईस्ट इंडिया कंपनी का वह प्रोजेक्ट भी समाप्त हो गया है.
ईस्ट इंडिया कंपनी का मूल इतिहास उस बड़ी ट्रेडिंग एंटिटी से जुड़ा है, जिसने 18वीं और 19वीं सदी में भारत पर राजनीतिक और आर्थिक अधिकार बनाया और भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की शुरुआत की. हालांकि, वह मूल कंपनी 1874 में औपचारिक रूप से बंद हो गई थी, लेकिन 2010 में ब्रिटिश‑इंडियन उद्यमी संजीव मेहता ने इस ब्रांड का नाम और राइट्स खरीदकर इसे फिर से लॉन्च किया.
मेहता ने ईस्ट इंडिया कंपनी को लंदन के मेफेयर इलाके में स्थित 97 न्यू बॉन्ड स्ट्रीट पर एक 2,000 वर्ग फुट के लक्ज़री फैमिली फूड और लाइफस्टाइल स्टोर के रूप में खोला, जहां प्रीमियम चाय, चॉकलेट, मसाले और फाइन फूड्स बेचे जाते थे. वह इस प्रोजेक्ट को एक “इतिहास का रिडेम्पशन” बताते थे, जिसका अर्थ है औपनिवेशिक शोषण के नाम को आधुनिक भारतीय व्यापारी के हाथों में बदलकर एक संवेदनशील, ह्यूमन‑सेंट्रिक ब्रांड बनाना.
हालांकि, कंपनी का यह आधुनिक वर्ज़न लंबे समय तक टिक नहीं पाया. कंपनी ने अक्टूबर 2025 में लिक्विडेटर नियुक्त करने का फैसला लिया, जिसके बाद ब्रिटिश मीडिया और फाइलिंग्स ने बताया कि ईस्ट इंडिया कंपनी लिमिटेड करीब 6 लाख पाउंड से ज़्यादा कर्ज में डूबी थी, जिसमें मुख्य रूप से ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स में रजिस्टर्ड पैरेंट ग्रुप को बकाया राशि, टैक्स अथॉरिटीज़ को लगभग 1.94 लाख पाउंड और कर्मचारियों की तनख्वाह के रूप में लगभग 1.63 लाख पाउंड शामिल थे.
इन रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी की वेबसाइट अब डाउन है, और लंदन की इनकी शानदार दुकान खाली पड़ी है, जिसे अब रेंट पर देने के लिए एजेंट्स के जरिए ऑफर किया जा रहा है. इसके अलावा संबंधित कंपनियां जिनके नाम में “East India” शब्द था और जो संजीव मेहता से जुड़ी थीं, उनमें से और कई कंपनियों को भी बंद कर दिया गया है या विंडिंग‑अप यानी आधिकारिक तौर पर बंद करने की प्रक्रिया में डाल दिया गया है.
1600 ई. में जब ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई थी, उसके बाद इस कंपनी ने अपना कारोबार बढ़ाते हुए भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में कदम रखा. कंपनी व्यापार के साथ इन देशों पर शासन भी करने लगी. भारत पर भी कंपनी के अधिकारियों का शोषण बढ़ने लगा था. 1857 की क्रांति के बाद भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन हो गया. भले ही कंपनी के हाथ से भारत का प्रशासन चला गया हो लेकिन इसने वैश्विक व्यापार को बदल दिया. औपनिवेशिक देशों में शोषण और अत्याचार को बढ़ावा दिया और देशों की समृद्ध अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया.
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