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Narak Chaturdashi 2026 Kab Hai: छोटी दिवाली पर जरूर करें ये काम, जानें अभ्यंग स्नान का खास महत्व

Narak Chaturdashi 2026 Date: नरक चतुर्दशी 8 नवंबर को मनाई जाएगी. जानें अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त, चतुर्दशी तिथि, पूजा विधि और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी नरकासुर वध की कथा.

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Published: November 4, 2026 17:26:33 IST
Last Updated: November 4, 2026 17:26:33 IST

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Narak Chaturdashi 2026: दीपावली का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है और इसकी हर तिथि का अपना धार्मिक महत्व है. इन्हीं में से एक है नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता है कि इस स्नान से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और नरक के भय से छुटकारा मिलता है. नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से भी जोड़ा जाता है.

नरक चतुर्दशी 2026 कब है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में नरक चतुर्दशी रविवार, 8 नवंबर को मनाई जाएगी. यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है. दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट पर शुरू होगी और 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी.

चूंकि 8 नवंबर को सूर्योदय के समय चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए इस दिन अभ्यंग स्नान किया जाएगा. छोटी दिवाली, नरक चतुर्दशी और रूप चौदस इसके प्रचलित नाम हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा और दीपदान की परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है.

नरक चतुर्दशी 2026 अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त

नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व बताया गया है. यह स्नान सूर्योदय से पहले, चंद्रोदय के बाद और चतुर्दशी तिथि के दौरान किया जाता है. दिल्ली के लिए 8 नवंबर 2026 को अभ्यंग स्नान का मुहूर्त सुबह 5 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा.

नरक चतुर्दशी 2026 के प्रमुख समय

  • पर्व की तारीख: 8 नवंबर 2026, रविवार

  • चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 7 नवंबर, सुबह 10:47 बजे

  • चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवंबर, सुबह 11:27 बजे

  • अभ्यंग स्नान मुहूर्त: सुबह 5:41 बजे से 6:38 बजे तक

  • स्थान: ऊपर दिए गए समय नई दिल्ली के लिए हैं.

अभ्यंग स्नान का समय शहर के अनुसार बदल सकता है. इसलिए अपने शहर के सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि जरूर करें.

नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान क्यों किया जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले शरीर पर तिल के तेल से मालिश करके स्नान करना शुभ माना जाता है. इस परंपरा को अभ्यंग स्नान कहा जाता है. कई जगह स्नान के दौरान उबटन लगाने और अपामार्ग यानी चिरचिटा के पौधे का उपयोग करने की भी परंपरा है.

मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक स्नान करने से व्यक्ति को नरक के भय से मुक्ति मिलती है. स्नान के बाद भगवान श्रीकृष्ण, यमराज और अपने कुल की परंपरा के अनुसार आराध्य देव की पूजा की जाती है. शाम के समय घर के बाहर और अलग-अलग स्थानों पर दीपक जलाने की परंपरा भी है.

नरकासुर वध की पौराणिक कथा

नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की कथा से जुड़ा हुआ है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नरकासुर नाम का असुर अपनी शक्ति के अहंकार में अत्याचार करने लगा था. उसने देवताओं और ऋषियों को परेशान किया. कई कथाओं में उसके द्वारा अनेक कन्याओं को बंदी बनाए जाने का भी उल्लेख मिलता है.

नरकासुर के बढ़ते अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी. इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर के विरुद्ध युद्ध किया. पौराणिक कथा के अनुसार युद्ध में नरकासुर का वध हुआ और उसके बंदी बनाए गए लोगों को मुक्ति मिली.

इस घटना को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. मान्यता है कि नरकासुर के वध के बाद लोगों ने प्रसन्नता में दीप जलाए थे. इसी परंपरा को नरक चतुर्दशी और छोटी दिवाली से जोड़कर देखा जाता है.

नरक चतुर्दशी पर दीपदान का महत्व

नरक चतुर्दशी पर दीपदान की भी परंपरा है. इस दिन यमराज के नाम से दीपक जलाने को यम दीपदान कहा जाता है. मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है.

शाम के समय घर के बाहर दीपक जलाए जाते हैं. इसके अलावा घर के प्रवेश द्वार, पूजा स्थल और अन्य स्थानों पर भी दीप रखे जाते हैं. कई परिवारों में इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और यमराज की पूजा की जाती है.

नरक चतुर्दशी का संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है. यह पर्व बुराई, अहंकार और अन्याय के अंत तथा जीवन में प्रकाश और सकारात्मकता के स्वागत का प्रतीक भी माना जाता है.

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Published: November 4, 2026 17:26:33 IST
Last Updated: November 4, 2026 17:26:33 IST

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Narak Chaturdashi 2026: दीपावली का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है और इसकी हर तिथि का अपना धार्मिक महत्व है. इन्हीं में से एक है नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता है कि इस स्नान से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और नरक के भय से छुटकारा मिलता है. नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से भी जोड़ा जाता है.

नरक चतुर्दशी 2026 कब है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में नरक चतुर्दशी रविवार, 8 नवंबर को मनाई जाएगी. यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है. दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट पर शुरू होगी और 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी.

चूंकि 8 नवंबर को सूर्योदय के समय चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए इस दिन अभ्यंग स्नान किया जाएगा. छोटी दिवाली, नरक चतुर्दशी और रूप चौदस इसके प्रचलित नाम हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा और दीपदान की परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है.

नरक चतुर्दशी 2026 अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त

नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व बताया गया है. यह स्नान सूर्योदय से पहले, चंद्रोदय के बाद और चतुर्दशी तिथि के दौरान किया जाता है. दिल्ली के लिए 8 नवंबर 2026 को अभ्यंग स्नान का मुहूर्त सुबह 5 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा.

नरक चतुर्दशी 2026 के प्रमुख समय

  • पर्व की तारीख: 8 नवंबर 2026, रविवार

  • चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 7 नवंबर, सुबह 10:47 बजे

  • चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवंबर, सुबह 11:27 बजे

  • अभ्यंग स्नान मुहूर्त: सुबह 5:41 बजे से 6:38 बजे तक

  • स्थान: ऊपर दिए गए समय नई दिल्ली के लिए हैं.

अभ्यंग स्नान का समय शहर के अनुसार बदल सकता है. इसलिए अपने शहर के सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि जरूर करें.

नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान क्यों किया जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले शरीर पर तिल के तेल से मालिश करके स्नान करना शुभ माना जाता है. इस परंपरा को अभ्यंग स्नान कहा जाता है. कई जगह स्नान के दौरान उबटन लगाने और अपामार्ग यानी चिरचिटा के पौधे का उपयोग करने की भी परंपरा है.

मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक स्नान करने से व्यक्ति को नरक के भय से मुक्ति मिलती है. स्नान के बाद भगवान श्रीकृष्ण, यमराज और अपने कुल की परंपरा के अनुसार आराध्य देव की पूजा की जाती है. शाम के समय घर के बाहर और अलग-अलग स्थानों पर दीपक जलाने की परंपरा भी है.

नरकासुर वध की पौराणिक कथा

नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की कथा से जुड़ा हुआ है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नरकासुर नाम का असुर अपनी शक्ति के अहंकार में अत्याचार करने लगा था. उसने देवताओं और ऋषियों को परेशान किया. कई कथाओं में उसके द्वारा अनेक कन्याओं को बंदी बनाए जाने का भी उल्लेख मिलता है.

नरकासुर के बढ़ते अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी. इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर के विरुद्ध युद्ध किया. पौराणिक कथा के अनुसार युद्ध में नरकासुर का वध हुआ और उसके बंदी बनाए गए लोगों को मुक्ति मिली.

इस घटना को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. मान्यता है कि नरकासुर के वध के बाद लोगों ने प्रसन्नता में दीप जलाए थे. इसी परंपरा को नरक चतुर्दशी और छोटी दिवाली से जोड़कर देखा जाता है.

नरक चतुर्दशी पर दीपदान का महत्व

नरक चतुर्दशी पर दीपदान की भी परंपरा है. इस दिन यमराज के नाम से दीपक जलाने को यम दीपदान कहा जाता है. मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है.

शाम के समय घर के बाहर दीपक जलाए जाते हैं. इसके अलावा घर के प्रवेश द्वार, पूजा स्थल और अन्य स्थानों पर भी दीप रखे जाते हैं. कई परिवारों में इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और यमराज की पूजा की जाती है.

नरक चतुर्दशी का संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है. यह पर्व बुराई, अहंकार और अन्याय के अंत तथा जीवन में प्रकाश और सकारात्मकता के स्वागत का प्रतीक भी माना जाता है.

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