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Roza Rakhne Aur Kholne Ki Dua: रोजा रखने और खोलने की दुआ, क्यों की जाती है अल्लाह की इबादत? जानें महत्व

Roza Rakhne or kholne ki Dua: मुसलमानों का पाक महीना रमजान चल रहा है. यह इस्लामिक कैलेंडर का 9वां महीना होता है. रमजान को इबादत, संयम और रहमत का महीना कहते हैं. जानिए रोजा रखने और खोलने की दुआ क्यों अहम है?

Roza Rakhne or kholne ki Dua: मुसलमानों का पाक महीना रमजान चल रहा है. यह इस्लामिक कैलेंडर का 9वां महीना होता है. रमजान को इबादत, संयम और रहमत का महीना कहते हैं. मुस्लिम कम्युनिटीज के लोग रमजान के पूरे महीने रोजा रखते हैं. साल 2026 में अगर 18 फरवरी को सऊदी अरब में चांद दिखने के साथ ही यह स्टार्ट हो जाता है. और 19 फरवरी से रमजान की शुरुआत मानी जाती है. साथ ही इसी दिन पहला रोजा भी रखा जाता है.

रोजा रखने के पीछे की वजह अल्लाह की इबादत कर उसकी रहमत हासिल करना होता है. रोजा के दौरान दिनभर ना तो कुछ खाया जाता है और ना ही पिया जाता है. भूखे-प्यासे रहने का मतलब यहां अपनी रूह को साफ करने और नेकी के रास्ते पर कदम बढ़ाने की एक इबादत होती है. 

सहरी के बाद रखा जाता है रोजा

रमजान महीने में सुबह फज्र की नमाज से पहले सहरी के बाद रोजा रखने का दस्तूर माना जाता है. फिर दिनभर भूखे-प्यासे रहकर अल्लाह की इबादत में हाथ खड़े होते हैं और अपने करम को करते हुए शाम को मगरिब की नमाज अदा की जाती है. फिर रोजा रखने वाले लोग इफ्तार करते हैं या खाना खाते हैं. यानी सुबह सूर्याोदय के बाद और शाम को सूर्यास्त के पहले तक रोजा रखने का रस्म-ओ-रिवाज है. इन सबके बीच रोजा को रखने और खोलने से पहले दुआ पढ़ना काफी अहम माना जाता है. (Roza Rakhne or kholne ki Dua)

रोज़ा रखने की दुआ (Roza Rakhne Ki Dua)

रोज़ा रखने से पहले सहरी के वक्त नीयत करना जरूरी होता है, क्योंकि यह पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत है. सेहरी के वक्त दुआ के जरिए रोजे की नीयत करना जरूरी है. रमजान को रहमत, मगफिरत और जहन्नम से निजात का महीना के तौर पर जाना जाता है. इसी महीने में मुस्लिमों का कुरआन शरीफ नाज़िल हुआ था. रोज़े का मतलब रूह को पाक करना और खुद को बुराइयों से बचाना भी है. 

रोज़े से इंसान को सब्र की सीख मिलती है. पूरे दिन जब भूखे-प्यासे रहा जाता है तो गरीबों की तकलीफ का एहसास भी होता है और इंसान के अंदर शुक्रगुजारी पैदा होती है. ऐसा कहा जाता है कि रमजान में की गई हर नेक इबादत का सवाब कई गुना बढ़ जाता है. इस महीने में की गई दुआ की खास अहमियत है. जब इफ्तार का वक्त होता है तब रोजेदार की दुआ खास तौर पर कबूल होती है. इसलिए रोज़ा खोलते वक्त अल्लाह का शुक्र अदा करना और खुद के अलावा परिवार और पूरी उम्मत के लिए दुआ करना अच्छा माना जाता है. (Roza Rakhne or kholne ki Dua)

डिस्क्लेमर – यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी और धार्मिक मान्यता पर आधारित है. हम किसी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते हैं. इंडिया न्यूज तथ्यों की पुष्टि नहीं करता है. 

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