Mysterious Story of Garbh Sanskar: हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विश्वविद्यालयों में ‘गर्भ संस्कार’ पढ़ाने और सरकारी अस्पतालों में ‘गर्भ संस्कार कक्ष’ बनाने की घोषणा की है. बस, इसी के साथ महाभारत के अभिमन्यु और महाज्ञानी अष्टावक्र की कहानियां फिर चर्चा में आ गई हैं. सवाल सिर्फ आस्था का नहीं, जिज्ञासा का भी है. लोग जानना चाहते हैं कि, क्या सच में गर्भ में बच्चा कुछ सीख सकता है? क्या है अभिमन्यु और अष्टावक्र के गर्भ में ज्ञान पाने की रोचक कहानी-
गर्भ संस्कार क्या है? जिसपर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दे रहे हैं जोर. (India News)
Mysterious Story of Garbh Sanskar: अभी तक बड़े-बुजुर्गों से सुनते आए थे कि, गर्भावस्था में मां जो सोचती है, जो सुनती है, उसका असर बच्चे पर पड़ता है. इसका जीता-जागता उदाहरण- महाकाल में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु हैं. अभिमन्यु ने अपनी मां के गर्भ में ही चक्रव्यू तोड़ने जैसा दिव्य ज्ञान अर्जित कर लिया था. धर्म शास्त्रों के मुताबिक, सनातन परंपरा में जिन 16 संस्कारों को जरूरी माना गया है, उसमें सबसे पहला गर्भ संस्कार आता है. इसका उद्देश्य मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से पवित्र होकर एक गुणी और स्वस्थ संतान को पाना है. इन दावों के पीछे जो पौराणिक कथाएं हैं, वे रोचक भी हैं और सोचने पर मजबूर भी करती हैं. यही वजह है कि, आज की पीढ़ी इसपर कम विश्वास करती है. लेकिन, आज फिर वही बात एक बार सुर्खियों में है.
हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विश्वविद्यालयों में ‘गर्भ संस्कार’ पढ़ाने और सरकारी अस्पतालों में ‘गर्भ संस्कार कक्ष’ बनाने की घोषणा की है. बस, इसी के साथ महाभारत के अभिमन्यु और महाज्ञानी अष्टावक्र की कहानियां फिर चर्चा में आ गई हैं. सवाल सिर्फ आस्था का नहीं, जिज्ञासा का भी है. लोग जानना चाहते हैं कि, क्या सच में गर्भ में बच्चा कुछ सीख सकता है? क्या है अभिमन्यु और अष्टावक्र के गर्भ में ज्ञान पाने की रोचक कहानी-
सीधी भाषा में समझें तो गर्भ संस्कार उस सोच पर टिका है कि गर्भवती महिला का खान-पान, व्यवहार, माहौल, संगीत, पढ़ी-सुनी बातें-सब बच्चे पर असर डालते हैं. गांवों में आज भी बुजुर्ग कहते मिल जाएंगे, ‘गर्भ में गुस्सा मत करो, बच्चा चिड़चिड़ा होगा’ या ‘अच्छी बातें सुनो, बच्चा समझदार बनेगा.’ यही लोकमान्यता धर्मग्रंथों में संस्कार के रूप में दिखती है.
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत की कथा तब तक अधूरी है, जब तक कि उसमें अभिमन्यु का जिक्र न हो. अभिमन्यु महाभारत के नायक अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे. जिनके गर्भ संस्कार की कहानी महाभारत के सबसे रोचक और महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक है जो यह दर्शाता है कि सनातन परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक जुड़ा हर संस्कार किस तरह चरित्र निर्माण के साथ मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक विकास में सहायक है. महाभारत की कथा के अनुसार एक बार अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह नामक विशेष युद्ध संरचना को भेदने की विधि बता रहे थे.
मान्यता है कि अर्जुन द्वारा सुभद्रा को चक्रव्यूह के बारे में बताई जाने वाली महत्वपूर्ण बातों को अभिमन्यु ने गर्भ में रहते हुए सुन रहे थे. इस कथा के अनुसार जब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद उससे बाहर निकलने का तरीका बता रहे थे, तभी उन्हें नींद आ गई. जिसके कारण अभिमन्यु चक्रव्यूह को भेदने की प्रकिया को नही जान सके. इस तरह सुभद्रा के गर्भ में उन्हें चक्रव्यूह में प्रवेश करने का ज्ञान तो प्राप्त हुआ लेकिन उसे भेदने का पूर्ण ज्ञान न हो पाया. कालांतर में महाभारत के युद्ध के समय उनका यही अधूरा ज्ञान उनकी मृत्यु का कारण बना.
अभिमन्यु की तरह गर्भ के दौरान दिव्य ज्ञान प्राप्ति जैसी ही कथा अष्टावक्र की भी मिलती है. अष्टावक्र प्रकांड विद्वान कहोड़ और सुजाता की संतान थे. मान्यता है कि जब अष्टावक्र अपनी माता सुजाता की कोख में थे तो उनकी मां सुजाता ने सोचा कि उनकी होने वाली संतान महाज्ञानी हो. इसके लिए उन्होंने अपने पति कहोड़ द्वारा शिष्यों को दी जाने वाली शिक्षा को सुनना प्रारंभ कर दिया. मान्यता है कि अष्टावक्र ने गर्भ में रहते हुए कुछ ही दिनों वेद और शास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर लिया और एक दिन जब उनके पिता कहोड़ वेद का पाठ कर रहे थे, तभी अष्टावक्र माता के गर्भ से बोल पड़े कि पिताजी आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं. इतना सुनते ही कहोड़ क्रोधित हो गए और उन्होंने इसे अपना अपमान समझते हुए अष्टावक्र से कहा कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है, इसलिये तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जायेगा.
इसके बाद अष्टावक्र ने आठ जगह से टेढ़े अंगों के साथ जन्म लिया, लेकिन बावजूद इसके वह दिव्य ज्ञान से संपन्न थे. मान्यता है कि एक बार बन्दी ऋषि ने उनके पिता को शास्त्रार्थ में हराकर नदी में डुबो दिया था. जब यह बात अष्टावक्र को पता चली तो वे सीधे राजा जनक की सभा में पहुंच गये और उन्होंने शास्त्रार्थ करके न सिर्फ बंदी ऋषि को हराकर अपने पिता को मुक्त कराया बल्कि ब्राह्मणों को भी वापस किया. इससे प्रसन्न होकर उनके पिता ने उन्हें श्राप से मुक्त होने के लिए समंगा नदी में स्नान करने को कहा. मान्यता है कि उस घटना के बाद उनका टेढ़ापन दूर हो गया और उन्होंने बाद में राजा जनक को जो उपदेश दिया वह आज ‘अष्टावक्र गीता’ के नाम जाना जाता है.
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