Evergreen Song: बॉलीवुड में कई ऐसी फिल्में हैं, जिन्होंने कम बजट में भी लोगों के दिलों में एक बेहतरीन छाप छोड़ी है और उनके गाने भी सुपरहिट रहे हैं. इनमें ही एक है नदिया के पार. उस फिल्म के गाने आज भी लोगों के जहन में हैं और झूमने को मजबूर कर देते हैं.
नदिया के पार का जोगी जी धीरे-धीरे सदाबहार गाना
Evergreen Song: हिंदी सिनेमा में अक्सर माना जाता है कि किसी फिल्म को बड़ी सफलता दिलाने के लिए बड़े सितारों का होना जरूरी है. हालांकि 1982 में आई ‘नदिया के पार’ ने इस सोच को गलत साबित कर दिया. फिल्म में उस दौर के अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, हेमा मालिनी या श्रीदेवी जैसे चर्चित नाम नहीं थे. इसके बावजूद गांव की जिंदगी, रिश्तों की सादगी और दिल छू लेने वाले संगीत ने इसे दर्शकों के बीच खास बना दिया. आज भी इस फिल्म के गीत सुनते ही एक अलग दौर की याद ताजा हो जाती है.
फिल्म के गीतों में ‘जोगी जी धीरे-धीरे’ की अपनी अलग पहचान है. होली के रंग, लोकभाषा और ग्रामीण माहौल से सजा यह गाना सुनने वाले को सीधे गांव की गलियों और त्योहार की रौनक में पहुंचा देता है. जसपाल सिंह, हेमलता, चंद्राणी मुखर्जी और सुशील कुमार ने इसे अपनी आवाज दी थी. लगभग 8 मिनट 14 सेकंड का यह गीत आज भी पुराने फिल्मी संगीत के प्रशंसकों के बीच लोकप्रिय है. इस गाने की खास बात यह है कि इसमें बनावटी चमक के बजाय लोकजीवन का रंग नजर आता है. यही वजह है कि कई दशक गुजरने के बाद भी इसकी मिठास कम नहीं हुई.
इस फिल्म के संगीत की चर्चा रविंद्र जैन के बिना अधूरी है. 28 फरवरी 1944 को अलीगढ़ में जन्मे रविंद्र जैन जन्म से दृष्टिहीन थे लेकिन उनकी दुनिया में संगीत की कोई कमी नहीं थी. महज चार साल की उम्र में उन्होंने संगीत की शुरुआती शिक्षा लेना शुरू कर दिया था. बाद में उन्होंने बाकायदा संगीत सीखा और मुंबई पहुंचकर फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई. उनकी धुनों में भारतीय लोकसंगीत और भावनाओं की गहरी छाप दिखाई देती थी.
फिल्म का आकर्षण सिर्फ ‘जोगी जी धीरे-धीरे’ तक सीमित नहीं था. कौन दिशा में लेके चला रे बतोहिया, सांची कहे तोरे आवन से, जब तक पूरे ना हो फेरे सात और गुंजा रे चंदन जैसे गीतों ने भी खूब लोकप्रियता हासिल की. पूरे संगीत एलबम ने फिल्म को लंबे समय तक यादगार बनाए रखा.
फिल्म में सचिन पिलगांवकर ने चंदन और साधना सिंह ने गुंजा का किरदार निभाया था. गोविंद मूनीस के निर्देशन में बनी इस फिल्म के निर्माता ताराचंद बड़जात्या थे. फिल्म की कहानी केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ से प्रेरित थी. इसकी शूटिंग उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में हुई थी. इसे बनाने में लगभग 18 लाख रुपये का खर्चा हुआ था लेकिन फिल्म ने लगभग 5.4 करोड़ रुपये का कारोबार किया था.
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