मंदिरों में कदम रखने से पहले जूते और चप्पल (Shoes and Sippers) उतारना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. लेकिन क्या आप इसके पीछे की असली वजह जानते हैं, क्यों में मंदिरों में प्रवेश करने से पहले हमेशा जूते और चप्पल उतारा चाहिए.
Why shoes are not allowed inside the temple
Spiritual Discipline & Science: आपमें से बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि, आखिर क्यों मंदिर में प्रवेश रखने से पहले हम अपने जूते और चप्पल को बाहर उतार देते हैं. क्या कभी आपके दिमाग में यह सवाल आया है. क्या है इसके पीछे की वजह जानने के लिए पूरी खबर पढ़िए.
यह तो सभी जानते हैं कि मंदिर को ‘देवताओं का घर’ माना जाता है. और जहां हमारे देवी और देवता वास करते हैं, वहां पर हम जूते और चप्पल महनक कैसे जा सकते हैं. मान्यताओं के मुताबिक, जूते-चप्पल बाहर की गंदगी, अशुद्धियों और नकारात्मक ऊर्जा को हमेशा अपने साथ लेकर आते हैं. इन्हें बाहर उतारना एक तरह से भगवान के प्रति सम्मान को पूरी तरह से दर्शाता है.
सनातन धर्म में पूजा-पाठ और ध्यान को काफी ज्यादा पवित्र माना जाता है, जिसके लिए शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि सबसे ज्यादा ज़रूरी होती है. तो वहीं, दूसरी तरफ मंदिरों में कदम रखने से पहले जूते-चप्पल को अपवित्र माना जाता है, इसलिए उन्हें बाहर उतारकर ही जाना चाहिए.
दरअसल, जूते-चप्पल सड़क और सार्वजनिक स्थानों पर चलकर आते हैं, जो लाखों बैक्टीरिया और गंदगी से पूरी तरह से भरे होते हैं, और मंदिर के अंदर उन्हें प्रवेश देने से बीमारियों का खतरा काफी ज्यादा भी बढ़ सकता है. तो वहीं, दूसरी तरफ जूते उतारने से मंदिर का वातावरण स्वच्छ और शांत बना रहता है, जो मन की शांति के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.
ऐसा माना जाता है कि मंदिरों का निर्माण इस प्रकार किया जाता है कि उनकी फर्श सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ी होती है. हालांकि, कई मंदिर की फर्शें पत्थर या धातु की बनी होती हैं जैसे तांबा. नंगे पैर चलने से शरीर सीधे धरती की प्राकृतिक ऊर्जा से जुड़ता है, जिसे वैज्ञानिक की भाषा में ‘अर्थिंग’ या ‘ग्राउंडिंग’ भी कहा जाता है.
मंदिर जैसी शांत जगहों पर नंगे पर चलने से तनाव और चिंता अपने आप ही धीरे-धीरे खत्म होने लगती है. यह पूरी तरह से मानसिक शांति को प्रदान करने में सबसे ज्यादा मददगार साबित भी होता है.
नंगे पैर चलने से पैरों के दबाव बिंदु यानी (Acupressure Points) बढ़ने लगते हैं, जिससे शरीर का रक्त संचार (Blood Circulation) पहले से और भी ज्यादा बेहतर होता है और मांसपेशियाँ अधिक सक्रिय हो जाती हैं. इसके साथ ही नंगे पैर चलने से पैरों को ज़मीन का सीधा अहसास होता है, जिससे शरीर को बेहतर संतुलन (Balance) बना रहता है.
इस प्रकार, जूते-चप्पल उतारने की प्रथा केवल परंपरा नहीं है, बल्कि यह स्वच्छ, शांत वातावरण बनाए रखने, सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ने, और इतना ही नहीं, मानसिक भटकाव कम करके पूजा और ध्यान में मन लाने का एक वैज्ञानिक तरीका माना जाता है.
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