Blood Kick Addiction Bhopal: नशा कोई भी सेहत के लिए हानिकारक ही होता है. आमतौर आपने शराब, स्मैक या फिर ड्रग का ही नशा सुना होगा. लेकिन, भोपाल के कुछ युवाओं के नशा अलग ही है. इनका नशा सुनेंगे तो एक बार सोचेंगे जरूर. जी हां, यह वो खतरनाक लत है, जिसमें युवा नशे के लिए जिंदगी को चलाने वाले खून का करते हैं. आइए जानते हैं कि, भोपाल में क्यों बढ़ा खून का नशा? क्या सच में ब्लड में नशा होता है? ब्लड किक क्या है? भोपाल तक कैसे पहुंचा यह खतरनाक नशा?
क्या है ‘Blood Kick’ की लत? जो बन सकती जान की दुश्मन. (Canva)
Blood Kick Addiction Bhopal: नशा कोई भी सेहत के लिए हानिकारक ही होता है. इसके बाद भी बड़ी संख्या में युवा इस खतरनाक लत के शिकार हैं. आमतौर आपने शराब, स्मैक या फिर ड्रग का ही नशा सुना होगा. लेकिन, भोपाल के कुछ युवाओं के नशा अलग ही है. इनका नशा सुनेंगे तो एक बार सोचेंगे जरूर. जी हां, यह वो खतरनाक लत है, जिसमें युवा नशे के लिए जिंदगी को चलाने वाले खून का करते हैं. विदेशों में पनपा यह खौफनाक नशे का ट्रेंड हमारे देश के लिए नया है. अब इसकी जड़ें भोपाल के युवाओं तक पहुंच चुकी हैं. बता दें कि, मेडिकल भाषा में इसे ‘ऑटोहेमोथेरेपी एब्यूज’ और आम बोलचाल में ‘ब्लड किक’ कहा जाता है. मात्र और मात्र कुछेक पल की खुशी या सुकून पाने की चाह में युवा अपने ही खून से खेल रहे हैं और अनजाने में मौत को दावत दे रहे हैं. अब सवाल है कि आखिर, भोपाल में क्यों बढ़ा खून का नशा? क्या सच में ब्लड में नशा होता है? ब्लड किक क्या है? भोपाल तक कैसे पहुंचा यह खतरनाक नशा? आइए जानते हैं इस बारे में-
भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भोपाल का हमीदिया अस्पताल, जहां रोज सैकड़ों मरीज इलाज के लिए आते हैं. लेकिन पिछले कुछ महीनों में यहां मनोरोग विभाग में पहुंचे कुछ युवा मरीजों ने डॉक्टरों को भी हैरान कर दिया. दरअसल, इन युवाओं में अजीब नशे की लत थी. पूछताछ में पता चला कि, वे खून का नशा करते थे. वे अपनी नस से खून निकालकर उसी खून को फिर शरीर में चढ़ाने लगे थे. उन्हें लगता था कि इससे शरीर में तुरंत एनर्जी आती है और अलग ही तरह का सुकून मिलता है. इस विदेशी उपज को ऑटोहेमोथेरेपी एब्यूज नाम दिया गया है.
मनोचिकित्सक डॉ. विवेक कुमार के मुताबिक, ब्लड किक कोई मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं, बल्कि एक बिहेवियरल एडिक्शन है. इसमें दिमाग इस क्रिया को किसी इनाम की तरह लेने लगता है. इंसान को भ्रम हो जाता है कि खून दोबारा चढ़ाने से उसे ताकत या यूफोरिया मिल रहा है, जबकि हकीकत में इसका कोई मेडिकल फायदा नहीं है. यह नशा खून का नहीं, उस पल का होता है जिसमें दर्द और राहत एक साथ महसूस होती है.
यह खतरनाक नशा युवाओं की बिना सोचे-समझे कुछ नया करने की प्रवृत्ति का परिणाम है. वे सही और गलत में अंतर करना भूल जाते हैं. डॉक्टर कहते हैं कि यह पारंपरिक नशा नहीं, बल्कि खतरनाक प्रयोग है. कुछ युवा ब्लड प्लाज्मा या अन्य कंपोनेंट्स इंजेक्ट कर ‘अलग तरह का असर’ महसूस करने की कोशिश करते हैं. मेडिकल साइंस में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि खून से नशा होता है. यह पूरी तरह से मिथक और जोखिम भरा व्यवहार है.
हेल्थ एक्सपर्ट की मानें तो, सोशल मीडिया इस तरह की लत के पीछे की बड़ी वजह है. युवा कुछ नया, अलग और खतरनाक करने की चाह में ऐसे वीडियो या पोस्ट देखकर इसे आजमाने लगते हैं. हालांकि, इसकी खूनी खेल की शुरुआत मजाक या जिज्ञासा से होती है, लेकिन धीरे‑धीरे यह लत बन जाती है. नतीजा यह होता है कि, जब तक इंसान समझ पाता है, तब तक वह उस अंधेरे में पहुंच चुका होता है, जहां से लौटना आसान नहीं होता है.
डॉक्टरों के अनुसार, ब्लड किक के पीछे अक्सर डिप्रेशन, सेल्फ‑हार्म की प्रवृत्ति या अटेंशन सीकिंग बिहेवियर हो सकता है. खुद को दर्द देकर सुकून ढूंढने की यह एक बीमार कोशिश है. विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि जिस खून से जिंदगी चलती है, उसी खून का नशा जिंदगी छीन सकता है. यह किक नहीं, बल्कि क्लिनिकल डेथ की तरफ बढ़ता कदम है.
डॉक्टर के मुताबिक, ब्लड किक के दुष्परिणाम बेहद खतरनाक हैं. बार‑बार खून निकालने और चढ़ाने से सेप्सिस, गंभीर इंफेक्शन, HIV, हेपेटाइटिस, नसों को नुकसान, खून के थक्के, एनीमिया और यहां तक कि ऑर्गन फेल्योर का खतरा रहता है. शरीर का नेचुरल सिस्टम बिगड़ जाता है और बोन मैरो पर भी दबाव पड़ता है. कई मामलों में यह लत अचानक मौत की वजह भी बन सकती है.
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