<
Categories: देश

Kerala Puzzle: केरल में बीजेपी को क्यों करना पड़ रहा संघर्ष, LDF, UDF या NDA, किसे मिलेगी कमान?

Kerala Puzzle: केरल में विधानसभा चुनाव 9 अप्रैल को होने हैं और एक बार फिर राजनीतिक मुकाबला मुख्य रूप से तीन प्रमुख मोर्चों के बीच होने की उम्मीद है. सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) का नेतृत्व CPI(M) कर रही है. विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का नेतृत्व कांग्रेस कर रही है और नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) का नेतृत्व BJP कर रही है. केरल में कुल 140 विधानसभा सीटें हैं. 2021 के चुनावों में LDF ने 99 सीटें हासिल कीं, कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने 41 सीटें जीतीं, जबकि BJP एक भी सीट जीतने में नाकाम रही. बीजेपी ने राज्य में अपनी पहली सीट 2016 में जीती थी.

Kerala Puzzle: केरल के 2026 के विधानसभा चुनाव राज्य के लंबे और खास राजनीतिक इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हो सकते हैं. ये चुनाव यह दिखा सकते हैं कि केरल की ऊपरी तौर पर स्थिर दिखने वाली दो ध्रुवीय व्यवस्था के नीचे जो बड़े बदलाव हो रहे हैं, वे असली हैं या उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है. क्या राज्य की दशकों पुरानी राजनीतिक संरचना पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का दबदबा रहा है, जो अब एक ऐतिहासिक बदलाव की ओर बढ़ रही है? क्या देश में धर्मनिरपेक्ष राजनीति के बचे-खुचे मज़बूत गढ़ों में से एक अब आखिरकार उस ‘भगवा लहर’ की चपेट में आने वाला है, जिसने 21वीं सदी के दूसरे दशक से ही भारत के ज़्यादातर हिस्सों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है?

केरल में अब जो राजनीतिक, सामाजिक और चुनावी रुझान सामने आ रहे हैं, वे इन सवालों की अहमियत को और भी बढ़ा देते हैं. 2024 के लोकसभा चुनावों और दिसंबर 2025 में हुए स्थानीय स्व-शासन (LSG) चुनावों के नतीजों से LDF के खिलाफ़ एक मज़बूत ‘सत्ता-विरोधी’ (anti-incumbency) लहर का संकेत मिलता है. LDF लगातार दो बार सत्ता में रहकर एक अनोखा रिकॉर्ड बना चुका है. इन नतीजों ने मिलकर UDF में नई जान फूँक दी है, जो सत्ता में वापसी के लिए काफ़ी समय से संघर्ष कर रहा था.

फिर भी, इन चुनावी नतीजों से मिलने वाला सबसे अहम और लीक से हटकर संकेत कहीं और ही छिपा है. वह है केरल की राजनीतिक बिसात पर BJP का धीरे-धीरे एक मामूली मौजूदगी से बढ़कर खेल का रुख बदलने वाली ताकत के रूप में उभरना. पिछले दो दशकों में पार्टी ने अपने वोट शेयर को लगभग 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत से भी ज़्यादा कर लिया है. जहां एक तरफ BJP के नेतृत्व वाले NDA ने 2024 में त्रिशूर से अपनी पहली लोकसभा सीट जीतकर एक ऐतिहासिक बाधा को तोड़ा, वहीं दूसरी तरफ LSG चुनावों में उसने तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्जा करके पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा. इस जीत के साथ ही राज्य की राजधानी में LDF का चार दशकों से चला आ रहा दबदबा भी खत्म हो गया.

अल्पसंख्यकों का किस ओर है झुकाव?

ये चुनावी नतीजे केरल की राजनीति में एक नया और अहम आयाम जोड़ते हैं. जहां BJP की शुरुआती बढ़त का ज़्यादातर श्रेय UDF के कमज़ोर पड़ने को जाता है, वहीं अब उसकी बढ़ती ताकत LDF के पारंपरिक सामाजिक और भौगोलिक गढ़ों में भी सेंध लगा रही है. उभरते हुए ये रुझान एक नए तरह के सामाजिक ध्रुवीकरण की ओर इशारा करते हैं, जो ‘वामपंथी’ (Left) राजनीति के अस्तित्व के लिए ही एक बड़ा खतरा बन सकता है. राज्य के दो अल्पसंख्यक समुदाय मुस्लिम और ईसाई की कुल आबादी में 45 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सेदारी है, जो UDF के पीछे एकजुट होते दिख रहे हैं. UDF उनका पारंपरिक राजनीतिक ठिकाना रहा है. वहीं, LDF अपने पुराने समर्थक आधारों हिंदू समुदायों, जिनमें एझवा जैसे पिछड़े वर्ग भी शामिल हैं के बीच BJP के सामने अपनी जमीन खोता जा रहा है.

ये नए रुझान साफ ​​तौर पर 2026 के विधानसभा चुनावों को केरल के राजनीतिक इतिहास में सबसे निर्णायक पड़ावों में से एक बनाते हैं. लेकिन यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों है, हमें केरल के अनोखे राजनीतिक विकास पर फिर से नज़र डालनी होगी. एक ऐसा विकास जिसने बार-बार राष्ट्रीय रुझानों और वैश्विक उम्मीदों को चुनौती दी है. केरल में विधानसभा चुनाव 9 अप्रैल को होने हैं और एक बार फिर राजनीतिक मुकाबला मुख्य रूप से तीन प्रमुख मोर्चों के बीच होने की उम्मीद है. सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) का नेतृत्व CPI(M) कर रही है. विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का नेतृत्व कांग्रेस कर रही है और नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) का नेतृत्व BJP कर रही है. केरल में कुल 140 विधानसभा सीटें हैं. 2021 के चुनावों में LDF ने 99 सीटें हासिल कीं, कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने 41 सीटें जीतीं, जबकि BJP एक भी सीट जीतने में नाकाम रही. बीजेपी ने राज्य में अपनी पहली सीट 2016 में जीती थी.

बीजेपी को करना पड़ रहा संघर्ष

BJP के नेतृत्व वाले NDA के लिए यह चुनाव राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ मज़बूत करने का एक अवसर है. क्योंकि, अब तक उसे अपने वोट शेयर को विधानसभा सीटों में बदलने में काफ़ी संघर्ष करना पड़ा है. गठबंधन को उम्मीद है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में त्रिशूर से सुरेश गोपी की जीत से मिली गति उसके कार्यकर्ताओं में नया जोश भर देगी, जिससे वह इस त्रिकोणीय मुकाबले में एक मज़बूत दावेदार के तौर पर उभरकर सामने आएगा. पिछले दो दशकों में विधानसभा चुनावों में तीनों मोर्चों का प्रदर्शन अक्सर स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों जैसा ही रहा है. जिस भी मोर्चे को स्थानीय चुनावों में बढ़त मिलती है वह अक्सर उस गति को विधानसभा चुनावों में भी आगे बढ़ाता है, जिससे वह सरकार बनाने की स्थिति में आ जाता है. यह पैटर्न कई चुनावी चक्रों में देखा गया है. पंचायत, नगरपालिका और निगम स्तर पर जनता का फैसला अक्सर विधानसभा चुनावों से पहले जनता के मौजूदा मूड का एक संकेतक होता है. 

सत्ताधारी LDF का नेतृत्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन कर रहे हैं. LDF के लिए यह चुनाव लगातार तीसरी बार सत्ता में बने रहने की उसकी क्षमता की एक महत्वपूर्ण परीक्षा है, जो केरल के चुनावी इतिहास में एक अभूतपूर्व उपलब्धि होगी. LDF 2021 में सत्ता में वापस लौटी थी, जिससे राज्य की बारी-बारी से सरकार बदलने की पुरानी परंपरा टूट गई थी. UDF का नेतृत्व विपक्ष के नेता, V.D. सतीशन कर रहे हैं. UDF को उम्मीद है कि वह LDF सरकार के खिलाफ चल रही सत्ता-विरोधी (anti-incumbency) भावना का लाभ उठा पाएगी. कांग्रेस नेताओं का मानना ​​है कि राज्य का राजनीतिक चक्र और साथ ही स्थानीय चुनावों में ज़ाहिर हुआ जनता का मूड सरकार बदलने के पक्ष में जा सकता है. 

राजनीतिक प्रयोगशाला

केरल को लंबे समय से भारत की राजनीतिक प्रयोगशाला कहा जाता रहा है और इसकी एक ठोस वजह भी है. 1957 में इस नए बने राज्य ने लोकतांत्रिक तरीके से एक कम्युनिस्ट सरकार चुनकर दुनिया के सामने एक ऐतिहासिक मिसाल कायम की. ऐसे समय में जब शीत युद्ध पूरी दुनिया में वैचारिक सीमाओं को और भी मज़बूत बना रहा था, केरल ने उन शुरुआती उदाहरणों में से एक पेश किया जहां कम्युनिस्टों ने गोली के बजाय मतपत्र (वोट) के ज़रिए सत्ता हासिल की. यह निर्णय महज एक ऐतिहासिक कौतूहल नहीं था. इसने कांग्रेस पार्टी को उसकी बुनियाद तक हिला दिया. आजादी के महज एक दशक बाद ही वही पार्टी जिसने आजादी की लड़ाई की अगुवाई की थी और भारतीय राजनीति पर जिसका दबदबा था, पहली बार एक संगठित विपक्ष के हाथों सत्ता से बेदखल हो गई.

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली घबराई हुई केंद्र सरकार ने लोकतंत्र को दरकिनार करते हुए केरल की ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकार को चुने जाने के महज़ दो साल बाद ही बर्ख़ास्त कर दिया. इसके लिए जो बहाना बनाया गया, वह था राज्य में क़ानून-व्यवस्था का चरमरा जाना और यह स्थिति भी कांग्रेस के नेतृत्व में चलाए गए एक हिंसक आंदोलन (मुक्ति संघर्ष) के कारण पैदा हुई थी. इस आंदोलन को हिंदू, ईसाई और मुस्लिम धार्मिक नेताओं के साथ-साथ अन्य निहित स्वार्थों का भी समर्थन हासिल था और यह आंदोलन ईश्वर विहीन कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ चलाया गया था. वे इस सरकार से ख़ास तौर पर इसलिए नाराज़ थे क्योंकि इसने भूमि सुधार लागू करने और शिक्षा के क्षेत्र में निजी तथा धार्मिक हितों को चुनौती देने का दुस्साहस किया था. 1959 में ई.एम.एस. सरकार की बर्ख़ास्तगी आज़ाद भारत में संविधान के अनुच्छेद 356 का पहला इस्तेमाल थी और नेहरू के लोकतांत्रिक साख पर लगा पहला दाग भी.

यूपी के बाद सबसे अधिक RSS कार्यकर्ता

केरल, तमिलनाडु की तरह, भारत में धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक व्यवहार के आखिरी मज़बूत गढ़ों में से एक रहा है. 2014 के बाद से पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के ऐतिहासिक विस्तार का इसने बार-बार विरोध किया है. 2024 में जीती गई एक अकेली लोकसभा सीट (त्रिशूर) और 2016 में जीती गई (और 2021 में हारी गई) एक अकेली विधानसभा सीट नेमोम को छोड़कर BJP को केरल के 68 साल के चुनावी इतिहास में लगभग पूरी तरह से खाली हाथ रहना पड़ा है, जो देश के बाकी हिस्सों में उसके दबदबे के बिल्कुल उलट है. यह बात इसलिए भी ज्यादा चौंकाने वाली है क्योंकि BJP की केरल में दशकों से मौजूदगी रही है. इस राज्य में देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की दूसरी सबसे ज़्यादा शाखाएं भी हैं.

5,000 से ज्यादा जो सिर्फ हिंदुत्व के गढ़ माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ही पीछे हैं. फिर भी हिंदुत्व का वैचारिक ढांचा यहां कभी भी लगातार राजनीतिक सत्ता में नहीं बदल पाया है. इसका एक कारण केरल की जनसंख्या संरचना है. यहां की लगभग 45% आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों मुसलमानों (26.56%) और ईसाइयों (18.38%) — से बनी है, जो भारत के बाकी हिस्सों में रहने वाले अपने समकक्षों की तुलना में सामाजिक-आर्थिक रूप से ज़्यादा मज़बूत और राजनीतिक रूप से ज़्यादा मुखर हैं. केरल का सामाजिक ताना-बाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. ज़ोरदार राजनीतिक लामबंदी और गहरी धार्मिक आस्था वाले समुदायों के बावजूद यह राज्य बड़े पैमाने पर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा या आतंकवाद से काफी हद तक मुक्त रहा है.

इन वर्ग को लुभाने की कोशिश

CPI(M) ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि एझवा समुदाय का एक बड़ा हिस्सा कभी वामपंथ की रीढ़ हुआ करता था अब NDA की ओर मुड़ गया है. कई नायर समुदाय के लोग भी वर्षों से BJP का समर्थन करते आ रहे हैं. BJP के उभार के पीछे एक अहम ताकत केरल का बढ़ता हुआ महत्वाकांक्षी और राजनीति से दूर रहने वाला मध्यम वर्ग है. वैश्वीकृत कार्य-संस्कृति, प्रवासन से अर्जित धन, निजी शिक्षा और उपभोग-केंद्रित आकांक्षाओं ने एक ऐसे जनसांख्यिकीय वर्ग को जन्म दिया है, जो केरल के पारंपरिक वाम-झुकाव वाले आर्थिक दृष्टिकोण से अब ऊब चुका है. इस वर्ग के लिए BJP का नव-उदारवादी विकास, उद्यमिता, डिजिटल शासन और सशक्त नेतृत्व का नैरेटिव काफी आकर्षक प्रतीत होता है. 

BJP ने ईसाइयों को लुभाने में भी अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है। हालाँकि उसके दावे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, लेकिन त्रिशूर के चुनावी नतीजों से यह संकेत मिलता है कि उसे इस दिशा में कुछ हद तक सफलता मिली है। चर्च का एक तबका—जो मुसलमानों की बढ़ती आबादी और आर्थिक दबदबे को लेकर चिंतित है—BJP के संदेश के प्रति कुछ हद तक खुलापन दिखाने लगा है. पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष और उद्यमी-राजनेता राजीव चंद्रशेखर के नेतृत्व में, BJP खुद को विकास, टेक्नोलॉजी और निवेश के इर्द-गिर्द नए सिरे से पेश कर रही है, जबकि साथ ही वह अपने राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिम-विरोधी बयानों को कम करके दिखा रही है.

Recent Posts

IPL 2027 से पहले CSK में बड़ा उलटफेर! धोनी को मिली बड़ी जिम्मेदारी, इयोन मॉर्गन से 20 करोड़ की डील पर फंसा पेंच

IPL 2027 से पहले चेन्नई सुपर किंग्स में बड़े बदलाव की चर्चा तेज है. स्टीफन…

Last Updated: September 10, 2026 00:06:09 IST

ESIC कार्ड को Aadhaar से लिंक करना जरूरी, नहीं तो रुक सकता है लाभ! घर बैठे जानें स्टेप-बाय-स्टेप पूरा प्रोसेस

ESIC Pehchan Card Aadhaar Linking: क्या आपका ESIC कार्ड आधार से लिंक है? श्रम मंत्रालय…

Last Updated: September 9, 2026 23:41:19 IST

Duleep Trophy Final 2026: मैच ड्रॉ हुआ तो किसे मिलेगी ट्रॉफी? BCCI के इस नियम ने तय कर दिया चैंपियन

East Zone vs South Zone Final: दलीप ट्रॉफी 2026 के फाइनल में ईस्ट जोन ने…

Last Updated: September 9, 2026 23:34:19 IST

Sahara India Refund: सहारा के निवेशकों के लिए बड़ी खुशखबरी! फिर शुरू हुआ रिफंड पोर्टल, ऐसे पाएं फंसा पैसा

Sahara India Refund CRCS Portal: सहारा इंडिया के निवेशकों के लिए बड़ी खबर! सहकारिता मंत्रालय…

Last Updated: September 9, 2026 22:29:53 IST

Anurag Kashyap: सड़क पर सोकर गुजारी रातें, फिर भी नहीं मानी हार, गैंग्स ऑफ वासेपुर से मिली पहचान

Anurag Kashyap: बॉलीवुड के जाने-माने एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर अनुराग कश्यप 54 साल के हो…

Last Updated: September 9, 2026 22:16:06 IST

IND vs AFG Live Streaming: वैभव सूर्यवंशी एक बार फिर मचाएंगे गदर! जानें कब, कहां और कैसे देखें LIVE मुकाबला

IND vs AFG Live Streaming: 15 साल के वैभव सूर्यवंशी भारत-अफगानिस्तान T20 सीरीज में गदर…

Last Updated: September 9, 2026 19:53:01 IST