Political Kissa: राजनीति में महिलाओं का दबदबा काफी देखने को मिल रहा है. चाहे फिर वह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण हों या फिर कंगना रनौत. इन सबसे इतर आज हम बात करने वालें तीन ऐसी सख्सियत से जिन्होंने न सिर्फ अपने बलबूते पर राज्य में झंडे गाड़े बल्कि अन्य पार्टियों की भी नाक में दम करके रख दिया. इन तीन महिलाओं ने विपक्ष को भी पानी पिलाकर रख दिया.
ममता बनर्जी, मायावती और जयललिता का सफर
Political Kissa: राजनीति में महिलाओं का दबदबा काफी देखने को मिल रहा है. चाहे फिर वह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण हों या फिर कंगना रनौत. इन सबसे इतर आज हम बात करने वालें तीन ऐसी सख्सियत से जिन्होंने न सिर्फ अपने बलबूते पर राज्य में झंडे गाड़े बल्कि अन्य पार्टियों की भी नाक में दम करके रख दिया. इन तीन महिलाओं ने विपक्ष को भी पानी पिलाकर रख दिया.
इनमें शामिल महिलाएं हैं तृणमूल कांग्रेस की तेज-तर्रार ममता बनर्जी, यूपी की मायावती और AIADMK की निर्विवाद सुप्रीमो जे. जयललिता. बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में तीन दशकों से भी ज़्यादा समय से चले आ रहे वाम मोर्चा के शासन को खत्म कर दिया. जयललिता तमिलनाडु में सबसे आगे रही हैं, और उन्होंने DMK तथा उसके मुखिया एम. करुणानिधि को राजनीतिक दांव-पेच में मात दी है.
इस साल पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं. इससे पहले, TMC प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई मुद्दों को लेकर सुर्खियों में रही हैं, जिनमें I-PAC दफ़्तर पर ED की छापेमारी भी शामिल है. एक तेज़-तर्रार नेता के तौर पर जानी जाने वाली ममता दीदी एक तेज़ और समझदार हस्ती हैं. उन्होंने महज़ 15 साल की उम्र में राजनीति की दुनिया में कदम रखा था. ममता बनर्जी अपनी भाषण-कला से अपने विरोधियों को पूरी तरह से मात देने में माहिर हैं. न सिर्फ़ राजनीति में बल्कि अपनी शैक्षणिक योग्यता के मामले में भी कई जाने-माने नेताओं से काफ़ी आगे हैं. राजनीति में उनका आना किसी पहले से सोची-समझी योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह उनके गहरे जुनून का नतीजा था. आइए, उनके शैक्षणिक सफ़र और राजनीति में उनके प्रवेश के बारे में विस्तार से जानते हैं.
ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी, 1955 को कोलकाता में हुआ था. वह एक मध्यम-वर्गीय बंगाली हिंदू परिवार से ताल्लुक रखती हैं. जब वह 17 साल की थीं, तब उचित इलाज न मिल पाने के कारण उनके पिता का निधन हो गया था. हालांकि घर की ज़िम्मेदारियों का बोझ और परिवार के हालात काफ़ी मुश्किल थे, फिर भी ममता ने अपनी पढ़ाई या अपने हौसले को कभी कमज़ोर नहीं पड़ने दिया.
ममता बनर्जी सिर्फ़ एक तेज तर्रार राजनीतिक नेता ही नहीं हैं बल्कि वह एक बेहद पढ़ी-लिखी इंसान भी हैं. साल 1970 में, उन्होंने देशबंधु शिशु शिक्षालय से अपनी हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद, उन्होंने जोगमाया देवी कॉलेज से इतिहास विषय में स्नातक (Bachelor’s) की डिग्री हासिल की. इसके अलावा, उनके पास कलकत्ता विश्वविद्यालय से इस्लामिक इतिहास में स्नातकोत्तर (Master’s) की डिग्री भी है.
बहुत कम लोगों को यह पता है कि ममता बनर्जी ने महज़ 15 साल की कम उम्र में ही राजनीति के मैदान में कदम रख दिया था. अपने कॉलेज के दिनों में उन्होंने छात्र राजनीति में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और ‘छात्र परिषद यूनियन’ की स्थापना की. यहीं पर उनके जोशीले स्वभाव और नेतृत्व क्षमता की झलक पहली बार सामने आने लगी. ममता ने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी. 1975 में, उन्हें पश्चिम बंगाल में ‘महिला कांग्रेस’ का महासचिव नियुक्त किया गया. हालांकि, पार्टी के भीतर के आपसी मतभेद जल्द ही बढ़ने लगे. इसके बाद ममता ने एक अहम फैसला लिया और ‘तृणमूल कांग्रेस’ (TMC) की नींव रखी. यही फ़ैसला आगे चलकर बंगाल की राजनीति में एक ‘गेम-चेंजर’ साबित हुआ.
मायावती एक भारतीय राजनेता हैं. वह न केवल BSP (बहुजन समाज पार्टी) राजनीतिक दल की सदस्य हैं, बल्कि इसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने चार बार उत्तर प्रदेश राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया है. उनकी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, धार्मिक अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों, साथ ही दलितों और बहुजन समुदाय के विकास, सशक्तिकरण और कल्याण से संबंधित पहलों पर ध्यान केंद्रित करती है.
मायावती का जन्म 15 जनवरी, 1956 को हुआ था. उनके पिता का नाम श्री प्रभुदास नंद और माता का नाम रामरती देवी था. 1975 में मायावती ने कालिंदी महिला कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय से बैचलर ऑफ आर्ट्स (B.A.) की डिग्री पूरी की. 1976 में, उन्होंने VMLG कॉलेज, गाजियाबाद से बैचलर ऑफ एजुकेशन (B.Ed.) की डिग्री प्राप्त की. इसके बाद, 1983 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ लॉ (LL.B.) की डिग्री पूरी की. इस शैक्षिक पृष्ठभूमि से प्रेरित होकर उनके मन में एक IAS अधिकारी बनने की प्रबल इच्छा जागी. 1989 में वह पहली बार संसद सदस्य (MP) चुनी गईं.
1984: बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कांशी राम ने की थी. कांशी राम और मायावती के नेतृत्व में, पार्टी ने पहली बार 9वीं लोकसभा के चुनाव लड़े.
1994: मायावती राज्यसभा की सदस्य बनीं.
1995: मायावती ने इतिहास रच दिया, जब वह भारत की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं. इस वर्ष उन्होंने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला.
1996–1998: मायावती राज्य विधानसभा में विधान सभा सदस्य (MLA) चुनी गईं.
1997: मायावती दूसरी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और 20 सितंबर, 1997 तक इस पद पर रहीं.
1998: मायावती दूसरी बार 12वीं लोकसभा की सदस्य चुनी गईं. वर्ष 1999: मायावती 13वीं लोकसभा की सदस्य बनीं.
वर्ष 2001: दलित नेता कांशी राम ने एक रैली में घोषणा की कि मायावती ही बहुजन समाज आंदोलन की एकमात्र उत्तराधिकारी होंगी.
फरवरी 2002: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मायावती फिर से चुनी गईं.
मार्च 2002: मायावती ने अकबरपुर लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया.
मई 2002: मायावती तीसरी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं.
वर्ष 2003: मायावती BSP की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं.
अप्रैल–मई 2004: वह एक बार फिर उत्तर प्रदेश की अकबरपुर सीट से 14वीं लोकसभा के लिए चुनी गईं.
जुलाई 2004: उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और दूसरी बार राज्यसभा की सदस्य बनीं.
वर्ष 2006: वह दूसरी बार पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनी गईं.
मई 2007: मायावती चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं.
जुलाई 2007: मायावती उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य चुनी गईं.
2 अप्रैल, 2018 को मायावती ने राज्यसभा की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. उनका मानना था कि अगर उन्हें सदन में मौजूद रहते हुए अपने लोगों की चिंताओं को उठाने की अनुमति नहीं दी जा रही है, तो फिर वहां रहने का क्या फ़ायदा?
1. 2003 में मुख्यमंत्री के तौर पर मायावती को पोलियो उन्मूलन की दिशा में उनके प्रयासों के लिए UNICEF, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और रोटरी इंटरनेशनल द्वारा ‘पॉल हैरिस फेलो अवार्ड’ से सम्मानित किया गया.
2. मायावती को राजर्षि शाहू मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा ‘राजर्षि शाहू अवार्ड’ से भी सम्मानित किया गया.
3. Time मैगज़ीन ने 2007 में भारत के 15 सबसे प्रभावशाली लोगों की अपनी लिस्ट में मायावती को शामिल किया.
4. 2008 में Forbes मैगज़ीन ने दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की अपनी लिस्ट में मायावती को 59वां स्थान दिया.
5. 2009 में Newsweek के एक आर्टिकल में उन्हें भारत की “बराक ओबामा” और प्रधानमंत्री पद की संभावित उम्मीदवार के तौर पर दिखाया गया.
2019 के लोकसभा चुनावों में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 10 सीटें जीतीं. यह ध्यान देने लायक बात है कि बहुजन समाज पार्टी के अभी राज्यसभा में 4 सदस्य हैं. आज भी भारतीय राजनीति में मायावती का कद काफी ऊंचा है. कई राष्ट्रीय राजनीतिक दल उनके फैसलों को बहुत गंभीरता से लेते हैं. मायावती को देश की एकमात्र ऐसी नेता माना जाता है जो अपने पूरे वोट बैंक को किसी भी दूसरी पार्टी को आसानी से ट्रांसफर करने में सक्षम हैं.
जयललिता का जन्म 24 फरवरी, 1948 को तत्कालीन मैसूर राज्य के मांड्या जिले के मेलुकोटे में हुआ था. उस समय मैसूर एक राज्य था. अब इसे कर्नाटक के नाम से जाना जाता है. अम्मा के नाम से फेमस जयललिता को यह नाम एक साल की उम्र में दिया गया था. इसके पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है. उनका नाम असल में उन दो घरों के नामों से लिया गया था जिनमें वह रहती थीं. वह मैसूर में रहती थीं उनके एक घर का नाम ‘जया विलास’ और दूसरे का नाम ‘ललिता विलास’ था. जब जयललिता सिर्फ दो साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया. पिता के निधन के बाद जयललिता और उनकी मां बेंगलुरु चली गईं.
रिपोर्ट्स के अनुसार, जयललिता ने मात्र तीन साल की उम्र में ही भरतनाट्यम में महारत हासिल कर ली थी. यह उनकी मां संध्या (जिन्हें वेदवती के नाम से भी जाना जाता था) ही थीं जिन्होंने जयललिता को सिनेमा की दुनिया से परिचित कराया. असल में, जयललिता की मां खुद एक अभिनेत्री थीं; इसलिए, उन्होंने अपनी बेटी को भी इस इंडस्ट्री में आने के लिए प्रोत्साहित किया. जयललिता ने 15 साल की उम्र में फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा. उस समय, वह एक छात्रा थीं और राज्य-स्तरीय शैक्षणिक टॉपर भी थीं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि जयललिता अपने पिता की तरह ही वकील बनना चाहती थीं. हालांकि, उनकी पहली फिल्म इतनी सफल रही कि वह रातों-रात घर-घर में जाना-पहचाना नाम बन गईं. अपने फिल्मी करियर के दौरान, जयललिता ने लगभग 85 तमिल फिल्मों में काम किया. उन्होंने धर्मेंद्र के साथ एक हिंदी फिल्म इज्ज़त में भी अभिनय किया.
फिल्म इंडस्ट्री में शानदार प्रतिष्ठा बनाने के बाद जयललिता ने राजनीति के क्षेत्र में भी अपनी काबिलियत साबित की. यह एम.जी. रामचंद्रन (MGR) ही थे जिन्होंने जयललिता को सिनेमा से राजनीति में आने में मदद की. वह 1982 में एम.जी. रामचंद्रन की पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK)—की सदस्य बनीं. 1984 से 1989 तक, जयललिता ने तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्यसभा सदस्य के रूप में कार्य किया. MGR के निधन के बाद जयललिता ने पार्टी की बागडोर संभाली और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं.
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान जयललिता ने वेतन लेने से मना कर दिया था. उन्होंने केवल एक रुपए का नाममात्र का वेतन लिया. उन्होंने छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया. जहां तक उनके निजी जीवन की बात है, जयललिता जीवन भर अविवाहित रहीं. 5 दिसंबर, 2016 को जयललिता हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं. हालांकि, वे अपने प्रशंसकों की यादों में आज भी जीवित हैं.
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