मर्दानी फ्रेंचाइजी की फिल्मों के आने से पहले ही एक रियल 'मर्दानी' ने कई बच्चों को 'चाइल्ड ट्रैफिकिंग' से बचाया था. आईपीएस अधिकारी मल्लिका बनर्जी ने 20 से ज्यादा ट्रैफिक्ड बच्चों को बचाया और 25 अवैध प्लेसमेंट एजेंसियों का पर्दाफाश किया जो छिपकर काम कर रही थीं.
आईपीएस मल्लिका बनर्जी का क्रांतिकारी अभियान
इन दिनों रानी मुखर्जी ‘मर्दानी’ बनकर सिनेमाघरों में छायी हुई हैं, लेकिन मर्दानी फ्रेंचाइजी की फिल्मों के आने से पहले ही एक रियल ‘मर्दानी’ ने कई बच्चों को ‘चाइल्ड ट्रैफिकिंग’ से बचाया था. हम बात कर रहे हैं, छत्तीसगढ़ की युवा आईपीएस अधिकारी मल्लिका बनर्जी की.
जब आईपीएस मल्लिका बनर्जी की छत्तीसगढ़ में नियुक्ति हुई तो वे एक अजीब सी बेचैनी महसूस कर रही थीं. एक युवा अधिकारी के तौर पर तैनात, उन्होंने देखा कि बच्चे गायब हो रहे हैं, एफआईआर दर्ज हैं, परिवार इंतजार कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही. उन्होंने महसूस किया बिना केस सॉल्व किये ही फाइलें बंद हो जा रही हैं, और परिवार के लोग न्याय की बाट जोह रहे हैं.
2012 से 14 के बीच छत्तीसगढ़ में बच्चों के गायब होने की कई रिपोर्ट लिखाई गयी. सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात सिर्फ आंकड़े नहीं थे. बल्कि ये कि लोग सब इतनी आसानी से भूल कैसे गए, उनको ढूंढ़ने के लिए कुछ किया क्यों नहीं गया. मल्लिका को वो अहसास होने लगा जो दूसरे नाम लेने से कतरा रहे थे. ये बच्चे गायब नहीं हुए थे. उन्हें उठाया गया था और एक ट्रैफिकिंग नेटवर्क में समेट लिया गया था.
ये ट्रैफिकिंग वैसे ही हुई थी, जैसे आमतौर पर होती है. प्लेसमेंट एजेंसियां, नौकरी के वादे, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में बेहतर जिंदगी का लालच और इन्हीं के नाम पर उठा लिया जाना. परिवार वाले कुछ दिन कोशिश करते हैं ढूंढ़ने की, पता लगाने की, लेकिन जब कुछ नहीं होता तो वो भी मन मसोसकर रह जाते हैं.
आईपीएस मल्लिका ने जब स्थिति देखी तो वो खुद को रोक नहीं पाईं। फिर उन्होंने वो रास्ता चुना जिसे ज्यादातर लोग चुनने से कतराते हैं. 2016 में मल्लिका बनर्जी गुप्त रूप से सेल्सवुमन बन गईं. गांवों में जाकर लोगों के दरवाजे खटखटातीं, कॉस्मेटिक्स बेचतीं, सिर मालिश का ऑफर देकर लोगों से जुड़तीं. वो लोगों से बातें करतीं और इस दौरान वो कम बोलतीं और ज्यादा सुना करतीं.
घर के आंगन और कमरों में लोग ऐसी बातें करने लगे जो पुलिसवाले को कभी न बताते. नाम उभरने लगे. धूल पड़ी फाइलें फिर खुलने लगीं और पुराने केस फिर सांस लेने लगे. इसके बाद जो हुआ वो बिलकुल फ़िल्मी नहीं था. धीमा, सुनियोजित, थकाने वाला पुलिसिया काम था.
उन्होंने लीड्स का पीछा किया, भूले-बिसरे एफआईआर दोबारा खोले, राज्यों के बीच तालमेल किया.
इस अभियान में उनकी टीम ने 20 से ज्यादा ट्रैफिक्ड बच्चों को बचाया और 25 अवैध प्लेसमेंट एजेंसियों का पर्दाफाश किया जो छिपकर काम कर रही थीं. जिन बच्चों ने अपने घर वापस लौटने का सपना देखना भी छोड़ दिया था और बेबसी के कारण घरवालों ने जिनका इन्तजार करना, उन बच्चों को वापस उनके घरवालों तक पहुंचाना किसी करिश्मा से कम नहीं था.
शक्ति वाहिनी जैसे एंटी-ट्रैफिकिंग संगठन लंबे समय से बता रहे हैं कि भारत में ये नेटवर्क कितने गहरे और संगठित हैं. ट्रैफिकिंग यहां शायद ही कभी हिंसक दिखती है. ये सब इतना सुनियोजित होता है कि लोगों को इसकी भनक भी नहीं लगती. इसलिए बचता है क्योंकि ये सामान्य लगता है. मल्लिका ने ये हकीकत बेहद करीब से देखी और सीधे उसमें कूद पड़ीं. उन्होंने केस क्रैक करने के लिए एक मास्टरप्लान बनाया और कई बच्चों को एक नयी जिंदगी दी.
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