Supreme Court on Maneka Gandhi: सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले में आलोचना करने पर मेनका गांधी को फटकार लगाई है. बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि पूर्व मंत्री ने कोर्ट की अवमानना की है.
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Supreme Court on Maneka Gandhi: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी, 2026) को बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के खिलाफ आवारा कुत्तों के मैनेजमेंट से जुड़े अपने आदेशों की आलोचना करने वाली टिप्पणियों के लिए कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया. न्यूज़ एजेंसी PTI के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की SC बेंच ने कहा कि पूर्व मंत्री ने “हर तरह की टिप्पणियां” की हैं और “कोर्ट की अवमानना की है”. बेंच ने कहा कि वह अपनी उदारता के कारण अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं कर रही है.
जस्टिस मेहता ने तो उनके वकील से यह भी पूछा कि पूर्व केंद्रीय मंत्री के तौर पर मेनका गांधी ने आवारा कुत्तों की समस्या को खत्म करने के लिए किस तरह के बजट आवंटन में मदद की थी. हालांकि इस पूरे मामले पर मेनका गांधी की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
बेंच ने कहा कि कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह बनाने पर उसकी टिप्पणी – जिसकी कुछ लोगों ने आलोचना की थी – व्यंग्य में नहीं बल्कि गंभीरता से की गई थी. 13 जनवरी को ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह राज्यों से कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए “भारी मुआवजा” देने और ऐसे मामलों के लिए कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराने के लिए कहेगा.
मेनका गांधी की ओर से पेश हुए सीनियर वकील राजू रामचंद्रन से सवाल करते हुए बेंच ने कथित तौर पर कहा कि आपने कहा कि कोर्ट को अपनी टिप्पणी में सावधान रहना चाहिए. लेकिन क्या आपने अपने क्लाइंट से पूछा है कि उन्होंने किस तरह की टिप्पणियां की हैं?… उन्होंने बिना सोचे-समझे सबके खिलाफ हर तरह की टिप्पणियां की हैं. क्या आपने उनकी बॉडी लैंग्वेज देखी है?” रामचंद्रन ने जवाब दिया कि वह आतंकवादी अजमल कसाब की ओर से भी पेश हुए हैं और बजट आवंटन एक नीतिगत मामला है. PTI की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की, “अजमल कसाब ने कोर्ट की अवमानना नहीं की, लेकिन आपके क्लाइंट ने की है.”
का किया मेनका गांधी ने पहले भी आवारा कुत्तों के खिलाफ जबरदस्ती वाले रवैये का विरोध किया है. उन्होंने कहा कि समस्या कभी कुत्ते नहीं थे. समस्या थी, और अभी भी है, उन्हें मैनेज करने के लिए बने सिविक सिस्टम का पूरी तरह से फेल होना. नगर पालिका के स्टेरिलाइज़ेशन प्रोग्राम सिर्फ़ कागज़ों पर हैं. कचरा हमारी सड़कों और कैंपस में फैला रहता है. अस्पताल खाना और बायोमेडिकल कचरा खुले में फेंकते हैं. और जब कुत्ते वहां इकट्ठा होते हैं जहां खाना और गंदगी होती है, तो जवाब यह नहीं होता कि कारण को ठीक किया जाए, बल्कि लक्षण को सजा दी जाती है. उन्होंने यह तर्क देते हुए कहा कि कोर्ट को “हमारे पब्लिक संस्थानों की असली हालत को देखने के लिए रुकना चाहिए था.”
उन्होंने लिखा है कि एक टूटे हुए सिस्टम से चमत्कार करने के लिए कहना कोई समाधान नहीं है. यह असफलता को मानना है.
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