CM Revanth Reddy: जब बच्चे भूल गए अपना फ़र्ज़, तो सरकार को उठाना पड़ा यह बड़ा कदम. क्या अब क़ानून सिखाएगा अपनों का साथ? तेलंगाना के इस फ़ैसले की पूरी कहानी।
माता-पिता की अनदेखी की तो कटेगी 15% सैलरी! बिल को मिली मंजूरी
Telangana Parental Care Bill: तेलंगाना विधानसभा ने ‘कर्मचारियों की माता-पिता की देखभाल की ज़िम्मेदारी’ बिल को मंज़ूरी दे दी है. इसका मकसद उन कर्मचारियों की सैलरी का एक हिस्सा काटना है जो अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल करने में नाकाम हैं. बिल पेश करते हुए मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि माता-पिता अपनी सारी ताक़त और संसाधन अपने बच्चों को पालने-पोसने में लगा देते हैं लेकिन बच्चे अक्सर आत्मनिर्भर होने के बाद उनकी अनदेखी कर देते हैं ऐसे में इस क़ानून का मकसद बुज़ुर्ग माता-पिता को सहारा और सुरक्षा देना है.
मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा, ‘केंद्र सरकार ने 2007 में बुज़ुर्गों के लिए एक क़ानून बनाया था. इस क़ानून के तहत माता-पिता को 10,000 रुपये से ज़्यादा की आर्थिक मदद देने का कोई प्रावधान नहीं है. बदकिस्मती से कुछ बच्चे ऐसा बर्ताव करते हैं जिससे समाज की बदनामी होती है.’ उन्होंने सदन को बताया, ‘यह बदकिस्मती है कि हमें एक ऐसे मामले पर क़ानून बनाने पर मजबूर होना पड़ रहा है जो असल में इंसानी प्यार और पारिवारिक रिश्तों से जुड़ा है.’
मुख्यमंत्री रेड्डी ने कहा, ‘जो कोई भी अपने माता-पिता की देखभाल करने में नाकाम रहता है, उसे समाज से निकाल देना चाहिए. जिस इंसान में अपने माता-पिता की देखभाल करने की क्षमता नहीं है उसे समाज में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. यह क़ानून न सिर्फ़ सरकारी कर्मचारियों पर, बल्कि चुने हुए प्रतिनिधियों पर भी लागू होता है.’
यह क़ानून सरकारी कर्मचारियों, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों पर लागू होता है. जो कर्मचारी अपने माता-पिता की देखभाल करने में नाकाम रहते हैं, उनकी महीने की सैलरी का एक हिस्सा खास तौर पर 15 फ़ीसदी या ज़्यादा से ज़्यादा 10,000, जो भी कम हो सीधे उनके माता-पिता के बैंक खातों में जमा किया जाएगा. यह कदम अधिकारियों के आधिकारिक निर्देशों के आधार पर सीधे लागू किया जाएगा. सरकार इस पहल को महज़ एक दंडात्मक उपाय नहीं मानती, बल्कि इसे एक सामाजिक हस्तक्षेप मानती है जिसका मकसद लोगों को उनकी नैतिक और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों की याद दिलाना है.
अगर माता-पिता को अपने बच्चों की लापरवाही की वजह से दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, तो उन्हें ज़िला स्तर पर एक तय अधिकारी को अर्ज़ी देनी होगी. यह अधिकारी जाँच करेगा और कर्मचारी तथा माता-पिता दोनों को अपनी शिकायतें बताने का मौका देगा. अर्ज़ी मिलने के 60 दिनों के अंदर इस मामले को सुलझाना ज़रूरी है.
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