IAS Rinku Singh Rahi: उत्तर प्रदेश में आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार उन्होंने 5 पन्नों के लेटर में कई मांगें की हैं. जिसमें उन्होंने काम के हिसाब से आधी सैलरी की मांग की है.
कौन हैं आइएएस रिंकू सिंह राही?
IAS Rinku Singh Rahi: उत्तर प्रदेश में पिछले कई दिनों से आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह चर्चा का विषय बने हुए हैं. इस बीच उनके 5 पन्नों के लेटर ने प्रशासनिक हलकों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है. उन्होंने न केवल अपनी पोस्टिंग और काम के स्वरूप पर सवाल उठाए हैं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक दखलअंदाजी और सुशासन के मॉडल पर भी अहम टिप्पणियां की हैं.
उन्होंने कहा है कि अगर उनका रोज का काम कम है, तो उन्हें आधी सैलरी दी जानी चाहिए या फिर उन्हें ऐसी जगह तैनात किया जाए जहां वे नियमों के मुताबिक काम कर सकें. उन्होंने दूसरे राज्य में ट्रांसफर की संभावना का भी सुझाव दिया.
रिंकू सिंह राही का सफर सीमित संसाधनों के साथ एक साधारण शुरुआत से देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा तक पहुंचा. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक साधारण परिवार में जन्मे रिंकू के पिता आटे की चक्की चलाते थे. आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की, स्कॉलरशिप की मदद से अपनी शिक्षा जारी रखी और आखिरकार इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की.
2008 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (PCS) की परीक्षा पास करने के बाद वे प्रशासनिक सेवा में आए. कई जिम्मेदारियां निभाते हुए हापुड़ में पोस्टिंग के दौरान उन्हें एक IAS-PCS कोचिंग सेंटर का डायरेक्टर नियुक्त किया गया. वहां अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों को पढ़ाया और उनका मार्गदर्शन किया.
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नौकरी के दौरान भी वे संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा की तैयारी करते रहे. उन्होंने 683वीं रैंक हासिल की और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में जगह बनाई. इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश कैडर मिला. अब 2023 बैच के IAS अधिकारी के तौर पर रिंकू सिंह राही एक बार फिर सुर्खियों में हैं.
रिंकू सिंह राही पहले जालौन जिले में उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) के पद पर तैनात थे. बाद में उनका ट्रांसफर उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (न्यायिक) के पद पर कर दिया गया. मौजूदा विवाद इसी ट्रांसफर और उसके बाद उनके द्वारा लिखे गए पत्र से जुड़ा है. अपने पत्र में रिंकू सिंह राही ने कहा है कि उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (न्यायिक) की भूमिका में दिन में केवल चार घंटे का ही काम होता है. इसलिए अगर वह पूर्णकालिक प्रशासनिक जिम्मेदारियां नहीं निभा पाते हैं तो “काम के अनुपात में वेतन” के सिद्धांत के आधार पर उनका वेतन आधा कर दिया जाना चाहिए.
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