Ravidassia Community: पंजाब के फगवाड़ा में रविदासिया समुदाय के हजारों सदस्य एक धार्मिक कार्यक्रम के लिए इकट्ठा हुए. इस कार्यक्रम का मकसद एक पुरानी मांग को फिर से उठाना था. आने वाली 2027 की जनगणना में एक अलग ‘रविदासिया धर्म’ कैटेगरी बनाई जाए. ‘अखिल भारतीय रविदासिया धर्म संगठन’ द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में श्रद्धालु, जन-प्रतिनिधि और प्रमुख संत शामिल हुए. कार्यक्रम के आखिर में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री को एक औपचारिक पत्र भी भेजा गया.
एक अलग धार्मिक पहचान बनाने की दशकों पुरानी कोशिशों के चलते, इस मांग ने उस बहस को फिर से छेड़ दिया है जो 2010 से चल रही है. चूंकि पंजाब में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, इसलिए औपचारिक मान्यता की इस मांग का न केवल संवैधानिक महत्व है, बल्कि राजनीतिक महत्व भी है. यह दलित समुदाय की बढ़ती मुखरता को दर्शाता है, जो अपनी आध्यात्मिक, सामाजिक और जनसांख्यिकीय स्थिति को मजबूत करने के लिए प्रयासरत है.
रविदासिया कौन हैं?
रविदासिया समुदाय गुरु रविदास का अनुयायी है. गुरु रविदास 14वीं से 16वीं सदी के दौरान उत्तर भारतीय भक्ति आंदोलन के एक रहस्यवादी कवि और संत थे. वाराणसी के पास मोची और चमड़ा कारीगरों के परिवार में जन्मे गुरु रविदास उस जाति से थे जिसे ऐतिहासिक रूप से छुआछूत का सामना करना पड़ा था. उन्होंने जाति और वर्ग की समानता का उपदेश दिया और ‘बेगमपुरा’ की अवधारणा पेश की, एक ऐसे शहर की आध्यात्मिक कल्पना जो दुख, भय और भेदभाव से मुक्त हो.
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कितनी आबादी है?
आज के समय की बात करें तो रविदासिया मुख्य रूप से एक दलित समुदाय है. इस समुदाय के ज्यादातर लोग लगभग 12 लाख पंजाब के दोआबा क्षेत्र में रहते हैं, जिसमें कपूरथला, होशियारपुर, नवांशहर और जालंधर जैसे जिले शामिल हैं. इसके अलावा, लगभग 20,000 सदस्य कैलिफ़ोर्निया, खासकर सेंट्रल वैली में रहते हैं. मुख्य रूप से पंजाबी मूल के ये सदस्य हाल ही में अपने राज्य में जातिगत भेदभाव को गैर-कानूनी घोषित कराने की वकालत करने के लिए सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं. वे समानता की लड़ाई को अपने आध्यात्मिक इतिहास का एक अभिन्न हिस्सा मानते हैं.
अलग धार्मिक पहचान की मांग क्यों कर रहे हैं?
समुदाय के नेताओं का कहना है कि रविदासिया समुदाय एक अलग धार्मिक पहचान के रूप में विकसित हुआ है, जिसकी अपनी पूजा-स्थलों, धर्मग्रंथों, प्रतीकों और धार्मिक मान्यताओं की अपनी अलग पहचान है. इसी विकास के कारण, उनका मानना है कि समुदाय को अन्य धर्मों के दायरे में शामिल करने के बजाय सरकारी रिकॉर्ड में अलग पहचान मिलनी चाहिए.
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