Why are there no seat belts in trains: कार या विमान से सफर करते समय सीट बेल्ट लगाना सुरक्षा के लिहाज से जरूरी माना जाता है. कार में सीट बेल्ट नहीं लगाने पर चालान भी कट सकता है. इसकी वजह यह है कि अचानक ब्रेक लगने या टक्कर होने की स्थिति में सीट बेल्ट यात्रियों को गंभीर चोटों से बचाने में मदद करती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ट्रेन में यात्रियों की सीटों पर सीट बेल्ट क्यों नहीं लगाई जाती? हैरानी की बात यह है कि हाई स्पीड बुलेट ट्रेन में भी आमतौर पर सीट बेल्ट नहीं होती. इसके पीछे ट्रेन की बनावट, दुर्घटनाओं की प्रकृति और सुरक्षा व्यवस्था जैसे कई कारण हैं.
ट्रेन और कार की टक्कर में होता है बड़ा अंतर
कार में सीट बेल्ट लगाने का सबसे बड़ा उद्देश्य टक्कर के दौरान यात्री को आगे की ओर उछलने या वाहन के अंदर किसी हिस्से से टकराने से बचाना है. जब कोई कार अचानक किसी ठोस चीज से टकराती है, तो वह बहुत कम समय में रुक सकती है. ऐसे में कार के अंदर बैठे व्यक्ति का शरीर गति के कारण आगे बढ़ता रहता है. सीट बेल्ट इस झटके को नियंत्रित करने और चोट का जोखिम कम करने में मदद करती है. ट्रेन की स्थिति इससे अलग होती है. ट्रेन का वजन बहुत अधिक होता है और उसकी बनावट भी कार से काफी अलग होती है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रेन को टक्कर लगने पर यात्रियों को चोट नहीं लग सकती. दुर्घटना की स्थिति में ट्रेन के डिब्बों के अंदर भी यात्रियों को गंभीर चोटें आ सकती हैं. अंतर यह है कि ट्रेनों की सुरक्षा व्यवस्था और दुर्घटनाओं से जुड़े जोखिम कारों से अलग होते हैं.
बुलेट ट्रेन में भी क्यों नहीं होती सीट बेल्ट?
हाई स्पीड ट्रेनें बहुत तेज रफ्तार से चलती हैं, इसलिए इनके लिए सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए जाते हैं. इनमें ट्रैक की निगरानी, सिग्नलिंग सिस्टम, गति नियंत्रण और आपातकालीन ब्रेक जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण होती हैं. इनका उद्देश्य दुर्घटना की आशंका को कम करना है. ट्रेन में सीट बेल्ट नहीं होने की एक वजह यह भी है कि मौजूदा सीटों की बनावट और उनके सुरक्षा ढांचे को सीट बेल्ट के अनुकूल बनाना आसान नहीं है. इसके लिए सीटों के डिजाइन में बदलाव करना पड़ सकता है. साथ ही, सीट बेल्ट का ऐसा सिस्टम तैयार करना जरूरी होगा, जो ट्रेन में होने वाली संभावित दुर्घटनाओं के दौरान वास्तव में यात्रियों की सुरक्षा बढ़ा सके.
ट्रेन के पटरी से उतरने या टक्कर होने पर क्या होगा?
ट्रेन में दुर्घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती हैं, लेकिन जब कोई ट्रेन पटरी से उतरती है या दूसरी ट्रेन से टकराती है, तो इसका असर गंभीर हो सकता है. ऐसी परिस्थितियों में डिब्बों को नुकसान पहुंचने, यात्रियों के गिरने और सामान इधर उधर होने का खतरा रहता है. इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि ट्रेन में सीट बेल्ट की जरूरत बिल्कुल नहीं पड़ती. असल सवाल यह है कि सीट बेल्ट लगाने से यात्रियों की सुरक्षा में कितना सुधार होगा और क्या इसके लिए सीटों की बनावट में बड़े बदलाव करना उचित होगा. इसका फैसला संबंधित सुरक्षा मानकों, तकनीकी आकलन और जोखिम के अध्ययन के आधार पर किया जाता है.
सीट बेल्ट लगाने से बढ़ सकती है लागत और असुविधा
ट्रेनों में सीट बेल्ट लगाने के लिए केवल बेल्ट लगाना ही पर्याप्त नहीं होगा. सीटों को उसके अनुरूप डिजाइन करना, उनकी मजबूती सुनिश्चित करना और सुरक्षा परीक्षण करना भी जरूरी होगा. इससे ट्रेन के निर्माण या मौजूदा डिब्बों में बदलाव की लागत बढ़ सकती है. इसके अलावा, जिन ट्रेनों में यात्री कम दूरी के लिए सफर करते हैं और बार बार चढ़ते उतरते हैं, उनमें सीट बेल्ट बांधने और खोलने से असुविधा भी हो सकती है. हालांकि, केवल इस असुविधा के आधार पर सुरक्षा संबंधी फैसला नहीं किया जा सकता. यह देखना जरूरी होता है कि किसी सुरक्षा उपाय से दुर्घटना के दौरान कितना लाभ मिलने की संभावना है.
ट्रेन, कार और विमान में किसका सफर ज्यादा सुरक्षित?
ट्रेन, कार और विमान की सुरक्षा की तुलना करते समय यह देखना जरूरी है कि आंकड़े किस आधार पर तैयार किए गए हैं. प्रति यात्रा, प्रति यात्री किलोमीटर और दुर्घटना में मृत्यु के जोखिम जैसे अलग अलग पैमानों पर परिणाम बदल सकते हैं. इसलिए बिना किसी स्पष्ट स्रोत और तुलना के यह कहना उचित नहीं होगा कि ट्रेन हर परिस्थिति में कार या विमान से अधिक सुरक्षित है. कुल मिलाकर, ट्रेनों में सीट बेल्ट नहीं होने के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है. ट्रेन की बनावट, यात्रियों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक, दुर्घटनाओं का जोखिम और सीटों के डिजाइन जैसे कई पहलू इसमें शामिल हैं. भविष्य में यदि तकनीकी अध्ययन से सीट बेल्ट या किसी अन्य सुरक्षा व्यवस्था का स्पष्ट लाभ सामने आता है, तो उसके अनुरूप बदलाव किए जा सकते हैं.